सच्चियाय माता मंदिर ओसियां जोधपुर | Sachiya Mata Temple Osian Jodhpur

सच्चियाय माता मंदिर, जोधपुर जिले के ओसियां गाँव में स्थित एक प्राचीन और प्रसिद्ध तीर्थस्थल है, जो देवी दुर्गा की अवतार सच्चियाय माता (सच्चिया माता) को समर्पित है। यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, जटिल नक्काशी, और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। ओसियां गाँव, जोधपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर थार मरुस्थल में बसा है, इसे “राजस्थान का खजुराहो” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ 8वीं से 12वीं सदी के प्राचीन मंदिरों का समूह है। सच्चियाय माता मंदिर इनमें मुख्य है, जो जैन और हिंदू दोनों धर्मों के भक्तों को आकर्षित करता है। यहाँ नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा और उत्सव आयोजित होते हैं, जो लाखों श्रद्धालुओं को खींचते हैं।

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सच्चियाय माता मंदिर ओसियां जोधपुर (Sachiya Mata Temple Osian Jodhpur)

मंदिर का नाम:-सच्चियाय माता मंदिर (ओसियां माता मंदिर)
स्थान:-ओसियां, जोधपुर, राजस्थान
समर्पित देवता:-सच्चियाय माता (देवी दुर्गा की अवतार)
निर्माण वर्ष:-8वीं सदी
निर्माता:-परमार राजा उपेंद्र
प्रसिद्ध त्यौहार:-नवरात्रि

सच्चियाय माता मंदिर ओसियां जोधपुर का इतिहास

सच्चियाय माता मंदिर के निर्माण का मुख्य काल 8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच माना जाता है। मंदिर का मूल निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था, और इसके बाद 12वीं शताब्दी में इसका व्यापक जीर्णोद्धार और विस्तार किया गया, जिससे यह अपने वर्तमान भव्य रूप में आया था। मंदिर के निर्माण का श्रेय परमार शासक महाराजा उत्पलदेव परमार को दिया जाता है।

एक प्रचलित लोककथा के अनुसार, देवी ने स्वप्न में राजा उत्पलदेव परमार को दर्शन दिए और ओसियां में स्थित नौलखा बावड़ी में छिपे स्वर्ण मुद्राओं के खजाने के बारे में बताया। इन स्वर्ण मुद्राओं का उपयोग करके ही राजा ने देवी के निर्देशानुसार इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस कथा में न केवल मंदिर के निर्माण का कारण मिलता है, बल्कि यह दैवीय प्रेरणा और राजशाही संरक्षण के महत्व को भी दर्शाती है।

पौराणिक लोककथाएं

सच्चियाय माता मंदिर की धार्मिक पहचान को समझने के लिए इससे जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाओं को जानना आवश्यक है – एक हिंदू परंपरा से और दूसरी जैन परंपरा से। ये कथाएं इस स्थल की बहुस्तरीय प्रकृति और धार्मिक संश्लेषण का प्रमाण हैं।

हिंदू पौराणिक कथा

हिंदू परंपरा में, देवी सच्चियाय को महिषासुर मर्दिनी का स्वरूप माना जाता है, जिनकी मूर्ति की चार भुजाएं हैं और वह स्वयं ही प्रकट हुई थीं। एक विस्तृत हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सच्ची असुर राजा पौलोमा की पुत्री थीं। राजा की सेना का प्रमुख वृत, सच्ची से विवाह करना चाहता था, लेकिन सच्ची ने उसे अयोग्य मानकर उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

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अस्वीकार किए जाने पर, वृत ने सेवा से त्यागपत्र दे दिया और भगवान शिव की घोर तपस्या की और उनसे ऐसा वरदान प्राप्त किया जो उसे किसी भी ज्ञात हथियार से अजेय बना देता था, अर्थात उसे किसी भी ज्ञात अस्त्र से नही मारा जा सकता था। इस वरदान से प्रसन्न होकर, वृत अपनी सेना के साथ राजा पौलोमा से भी बड़ा राज्य बनाने के लिए एक अभियान पर निकल पड़ा था।

वृत के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, देवताओं के राजा इंद्र ने हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया था। वृत की अजेयता को जानते हुए, इंद्र ने ऋषि दधीचि से उनकी हड्डियों का दान मांगा। ऋषि के आत्म-बलिदान से, इंद्र ने वज्र नामक एक अत्यंत शक्तिशाली हथियार बनाया था। इंद्र ने इस वज्र से वृत को युद्ध में पराजित किया और सच्ची से विवाह किया था। इस प्रकार, देवी सच्चियाय को इंद्र की पत्नी इंद्राणी के रूप में भी जाना जाता है।

जैन लोककथाएं: चामुंडा से सच्चियाय माता तक

जैन परंपरा में मंदिर का इतिहास एक शक्तिशाली परिवर्तन की कहानी से जुड़ा है। इस कथा के अनुसार, प्राचीन उपकेशपुर (ओसियां) में मूल रूप से देवी चामुंडा या ‘जगत भवानी’ का एक मंदिर था। इस मंदिर में नवरात्रि के दौरान भैंसों की बलि चढ़ाई जाती थी ताकि देवी को प्रसन्न किया जा सके।

जैन भिक्षु आचार्य रत्नप्रभसूरि ने जब इस पशु बलि को देखा, तो वे बहुत दुखी हुए थे। उन्होंने राजा और उनके मंत्री उहड़ को अहिंसा के महत्व के बारे में समझाया और इस क्रूर प्रथा को समाप्त करने के लिए राजी किया था। इस हस्तक्षेप से क्रोधित होकर, देवी चामुंडा ने भिक्षु को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। हालाँकि, भिक्षु की दृढ़ता और धार्मिक निष्ठा से देवी का हृदय परिवर्तित हो गया। उन्होंने बलि को त्याग दिया और वचन दिया कि वह अब से रक्त या लाल रंग की कोई भी वस्तु (जैसे लाल फूल) स्वीकार नहीं करेंगी।

इस परिवर्तन से प्रसन्न होकर, आचार्य रत्नप्रभसूरि ने देवी को ‘सच्ची माता’ या ‘सच्ची मां’ का नया नाम दिया, क्योंकि उन्होंने सच्चाई और अहिंसा के मार्ग को स्वीकार कर लिया था। इसी घटना के बाद, राजा उत्पलदेव, उनके मंत्री और पूरे नगर के लोग जैन धर्म में परिवर्तित हो गए, और उनकी यह नई शाखा ‘ओसवाल’ कहलाई थी।

मंदिर की स्थापना ने क्षेत्र में धार्मिक और सामाजिक एकता को बढ़ावा दिया, और यह हिंदू और जैन दोनों समुदायों के लिए एक साझा तीर्थस्थल बन गया। सच्चियाय माता मंदिर को ओसियां माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

सच्चियाय माता मंदिर ओसियां जोधपुर की वास्तुकला और संरचना

सच्चियाय माता मंदिर की वास्तुकला नागर शैली में है, जो प्राचीन भारतीय मंदिर वास्तुकला का एक प्रमुख रूप है। यह शैली अपनी जटिल नक्काशी, ऊँचे शिखर, और सममित संरचना के लिए जानी जाती है। मंदिर का डिज़ाइन हिंदू और जैन दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाओं को समेटता है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों की एक लंबी श्रृंखला है, जिसके ऊपर खूबसूरती से तराशे गए मेहराबदार द्वार (तोरण द्वार) की एक श्रृंखला हैं। मंदिर के गर्भगृह में सच्चियाय माता (देवी दुर्गा की अवतार) की मूर्ति है। यह मूर्ति काले पत्थर से बनी है और पारंपरिक आभूषणों से सजी होती है। देवी मूर्ति की चार भुजाएं है। गर्भगृह के सामने एक मंडप (सभा हॉल) है।

मंदिर की संरचना में एक बड़ा केंद्रीय गुंबद है, जिसके कोनों पर चार छोटे गुंबद बने हुए हैं, जो इसकी भव्यता को बढ़ाते हैं। मुख्य मंदिर के अलावा, परिसर में चंडी माता और अंबा माता को समर्पित दो अन्य मंदिर भी हैं, जिनका निर्माण लगभग 1178 ईस्वी में हुआ था।

मंदिर की दीवारें और स्तंभ हिंदू पौराणिक कथाओं की कहानियों को दर्शाने वाली जटिल मूर्तियों और नक्काशी से भरे हुए हैं। मंदिर में महिषासुर मर्दिनी की स्वयंभू मूर्ति के साथ-साथ भगवान विष्णु के वराह अवतार, विष्णु-लक्ष्मी और अन्य विभिन्न हिंदू देवी-देवता की मूर्तियां स्थापित है।

सच्चियाय माता मंदिर ओसियां जोधपुर धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

सच्चियाय माता मंदिर का महत्व विभिन्न समुदायों के लिए गहरा है, और यह अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है। माता को ओसवाल जैन समुदाय की कुलदेवी माना जाता है, जिनकी उत्पत्ति इसी स्थान से हुई थी। जैन समुदाय के लोग यहां मुंडन जैसे मांगलिक कार्यक्रम करने आते हैं। इसके अलावा, परमार राजपूत, चारण, पारीक (ब्राह्मण) और कई अन्य समुदायों द्वारा भी उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।

मंदिर में दो प्रमुख त्योहार साल भर में मनाए जाते हैं: चैत्र और आसोज (आश्विन) मास की नवरात्रि। इन दोनों अवसरों पर नौ दिनों का भव्य मेला और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। अष्टमी की रात को यहां एक अनोखी परंपरा का पालन किया जाता है, जिसमें ओसियां गांव के सभी लोग यज्ञ की अग्नि को देखकर ही अपना एकासना उपवास तोड़ते हैं।

मान्यता है कि जो भी सच्चियाय माता को अपनी कुलदेवी मानता है वे अपने परिवार के जात, जडूले या प्रसादी चढ़ाने के बाद रात्रि में ओसियां में नही रुक सकते। मंदिर ट्रस्ट द्वारा भक्तों के लिए ठहरने की आधुनिक सुविधाएं (एसी और नॉन-एसी कमरे) प्रदान की गई हैं। मंदिर का प्रबंधन स्थानीय ट्रस्ट और पुजारी परिवारों द्वारा किया जाता है, जो इन परंपराओं और कथाओं को संरक्षित करते हैं।

सच्चियाय माता मंदिर ओसियां जोधपुर तक कैसे पहुँचें?

मंदिर का स्थान: सच्चियाय माता मंदिर राजस्थान के जोधपुर जिले के ओसियां गाँव स्थित है, जो जोधपुर शहर से लगभग 65 किलोमीटर दूर है।

मंदिर तक पहुंचने के विकल्प इस प्रकार है:

  • हवाई मार्ग: जोधपुर हवाई अड्डा (Jodhpur Airport) मंदिर से लगभग 60 से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई अड्डे से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
  • रेल मार्ग: जोधपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। रेलवे स्टेशन से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं। ओसियां में भी एक छोटा रेलवे स्टेशन (ओसियां रेलवे स्टेशन) है, जो मंदिर से 2-3 किलोमीटर दूर है।
  • सड़क मार्ग: मंदिर जोधपुर बस स्टैंड से लगभग 59-65 किलोमीटर दूर है और NH62 के माध्यम से सड़क मार्ग से आसानी से सुलभ है। आप टैक्सी, बस, या अन्य सड़क परिवहन सेवाएँ लेकर जोधपुर पहुँच सकते हैं। जोधपुर पहुँचने के बाद, आप स्थानीय बस, टैक्सी, या ऑटो-रिक्शा से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।

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