कोडमदेसर भैरू जी मंदिर, बीकानेर से लगभग 24 किलोमीटर दूर कोडमदेसर गांव में स्थित एक धार्मिक स्थल है। यह मंदिर भैरू जी (जो भगवान शिव के भैरव रूप हैं) को समर्पित है और बीकानेर की धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस मंदिर की खासियत इसकी खुले आसमान के नीचे की संरचना और बीकानेर के राजपरिवार, विशेष रूप से राव बीका जी, से इसका गहरा संबंध है। भैरू जी को बीकानेर की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है, और वार्षिक मेला, विशेष रूप से भैरू अष्टमी पर, हजारों भक्तों को आकर्षित करता है।
कोडमदेसर भेरुजी मंदिर बीकानेर (Kodamdesar Bhairu Ji Temple Bikaner)
मंदिर का नाम:- | कोडमदेसर भेरुजी मंदिर (Kodamdesar Bhairu Ji Temple) |
स्थान:- | कोडमदेसर गाँव, बीकानेर, राजस्थान |
समर्पित देवता:- | भगवान भैरव (भैरू जी) |
निर्माण वर्ष:- | लगभग 15वीं शताब्दी (संभवतः 1475 ईस्वी) |
निर्माता:- | राव बिकाजी (बीकानेर के संस्थापक) |
मुख्य आकर्षण:- | खुले आसमान के नीचे की मंदिर संरचना |
प्रसिद्ध त्यौहार:- | भैरव अष्टमी, नवरात्रि |
कोडमदेसर भेरुजी मंदिर बीकानेर का इतिहास
कोडमदेसर भैरूजी मंदिर की स्थापना की कहानी बीकानेर राज्य के उद्भव से गहराई से जुड़ी हुई है। अपने पिता राव जोधा से मतभेद के बाद, राव बीका ने 1465 ईस्वी में जोधपुर छोड़ दिया और एक नए राज्य की स्थापना के लिए निकल पड़े थे। इस यात्रा में उनके साथ उनके भैरव भक्त देदो जी माली भी थे, जो मंडोर से एक टोकरी में भैरव जी की प्रतिमा लेकर आए थे।
इस यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना घटी। मान्यता के अनुसार, भगवान भैरवनाथ ने देदो जी से कहा था कि “तुम जहां भी पीछे मुड़कर मुझे देखोगे, मैं वहीं रुक जाऊंगा”। जब वे कोडमदेसर पहुँचे और देदो जी ने पीछे मुड़कर देखा, तो टोकरी में रखी प्रतिमा इतनी भारी हो गई कि उसे हिलाना असंभव हो गया था। इसी स्थान पर भैरवनाथ हमेशा के लिए स्थापित हो गए थे।
यह कहानी एक राजनीतिक निर्णय (राव बीका का नया राज्य स्थापित करना) और एक आध्यात्मिक हस्तक्षेप (प्रतिमा का वहीं रुक जाना) के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती है। यह राव बीका की यात्रा को केवल एक रणनीतिक प्रवास नहीं, बल्कि एक दैवीय मार्गदर्शन से निर्देशित यात्रा के रूप में प्रस्तुत करती है। इस घटना के बाद, राव बीका ने बीकानेर की नींव रखने से पहले तीन साल तक इसी स्थान से अपनी रियासत का संचालन किया था।
गाँव और सरोवर का नामकरण
एक लोककथा इस नामकरण की एक और भावनात्मक कहानी प्रस्तुत करती है। इस कथा के अनुसार राव चुंडा राठौड़ के बेटे की अड़कमल की सगाई छापर द्रोणपुर के राजा मानकराव मोहिल की बेटी राजकुमारी कोडमदे के साथ होती है, लेकिन राजकुमारी कोडमदे इस शादी से मना कर देती है। उसके बाद उसका विवाह पुंगल के राव राणकदे भाटी के बेटे कुंवर सादे (शार्दुल) के साथ होता है।
जैसे ही इस बात का पता अड़कमल को चलता है, वह सहन नही कर पाते है। जब कोडमदे और शार्दुल विवाह करके जा रहे होते है, तब अड़कमल उन पर हमला कर देता है। इस हमले में पुंगल के राजकुमार की मृत्यु हो जाती है। अपने पति की मृत्यु के बाद, कोडमदे ने अपने आभूषणों को बेचकर एक तालाब का निर्माण करवाया और वहीं सती हो गईं। इसलिए इस तालाब को कोडमदेसर सरोवर कहते है।
कोडमदेसर भेरुजी मंदिर बीकानेर की वास्तुकला और संरचना
कोडमदेसर भैरूजी मंदिर की सबसे विशिष्ट और आकर्षक विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से खुले आसमान के नीचे स्थित है और इसकी कोई छत नहीं है। कई भक्तों और यहां तक कि बीकानेर के महाराजाओं ने भी इस पर भव्य छत बनाने के प्रयास किए, लेकिन लोककथाओं के अनुसार, ये प्रयास हमेशा विफल रहे, और छत अपने आप ढह जाती थी।
मंदिर का गर्भगृह, जहां भैरू जी की मूर्ति स्थापित है, इसका केंद्रीय हिस्सा है। मूर्ति एक ऊंचे चबूतरे पर रखी गई है, जो भक्तों के लिए पूजा और दर्शन का मुख्य केंद्र है। गर्भगृह के चारों ओर खुला प्रांगण है, जो भक्तों को प्रार्थना, अनुष्ठान, और ध्यान के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करता है।

मंदिर परिसर में एक महत्वपूर्ण कीर्तिस्तंभ है, जो माता कोडमदे के निमित्त बनवाया गया था। कीर्तिस्तंभ की नक्काशी और डिज़ाइन राजपूत शैली की भव्यता को उजागर करते हैं, और यह मंदिर परिसर का एक अभिन्न हिस्सा है।
कोडमदेसर भेरुजी मंदिर बीकानेर धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
भगवान भैरवनाथ को भगवान शिव का एक उग्र अवतार माना जाता है, जिनका जन्म उनके भृकुटी से हुआ था । उन्हें ‘भय हरने वाले’ यानी सभी प्रकार के भय को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान भैरवनाथ विशेष रूप से शनि और राहु जैसे ग्रहों से पीड़ित लोगों के लिए संकटमोचक माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए भैरवनाथ की शरण में आना चाहिए।
कोडमदेसर मंदिर में पूरे साल भव्य पूजा-अर्चना, जागरण, महाप्रसादी, अभिषेक और श्रृंगार के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। भगवान भैरवनाथ का दिन रविवार माना जाता है, और इस दिन यहां भारी संख्या में भक्तगण दर्शन के लिए आते हैं। यहां कुछ अनूठी प्रथाएं भी प्रचलित हैं। भैरव बाबा के प्रिय श्वान (कुत्ते) को उनका वाहन माना जाता है और वे मंदिर परिसर में मौजूद रहते हैं।
कोडमदेसर में भाद्रपद माह में लगने वाला मेला सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है। इस दौरान पूरे देश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। मेले के अलावा, अमावस्या, अष्टमी और चौदस जैसे विशेष दिनों पर भी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ रहती है। इन अवसरों पर, नवविवाहित जोड़े और छोटे बच्चों के पहले मुंडन (जात-झडूले) जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान किए जाते हैं, जो इस स्थान के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को दर्शाते हैं।
कोडमदेसर भेरुजी मंदिर बीकानेर तक कैसे पहुँचें?
मंदिर का स्थान: कोडमदेसर भेरुजी मंदिर राजस्थान के बीकानेर जिले के कोडमदेसर गांव में स्थित है। यह मंदिर बीकानेर से लगभग 26 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
मंदिर तक पहुंचने के विकल्प इस प्रकार है:
- हवाई मार्ग: नाल हवाई अड्डा बीकानेर (Bikaner Airport) मंदिर से लगभग 10 से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई अड्डे से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
- रेल मार्ग: कोडमदेसर भेरुजी मंदिर का नजदीकी रेलवे स्टेशन बीकानेर रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। रेलवे स्टेशन से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
- सड़क मार्ग: मंदिर बीकानेर बस स्टैंड से लगभग 26 किलोमीटर दूर है। आप टैक्सी, बस, या अन्य सड़क परिवहन सेवाएँ लेकर बीकानेर पहुँच सकते हैं। बीकानेर पहुँचने के बाद आप स्थानीय बस, टैक्सी, या ऑटो-रिक्शा से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।