भंवाल माता मंदिर भंवालगढ़ नागौर: इतिहास, वास्तुकला, संरचना और धार्मिक प्रथाएं

भंवाल माता मंदिर राजस्थान के नागौर जिले की मेड़ता तहसील में भंवाल गांव में स्थित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। यह मंदिर रुद्राणी माता (काली माता) और ब्रह्माणी माता को समर्पित है तथा इसे ढाई प्याला माता के नाम से भी जाना जाता है। यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है जो मेड़ता शहर से लगभग 20-30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नवरात्रि में हजारों भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह शक्तिपीठ अक्सर जोधपुर के निकट बिरामी गाँव में स्थित भुवाल माता मंदिर के साथ भ्रमित हो जाता है।

भंवाल माता मंदिर भंवालगढ़ नागौर (Bhanwal Mata Temple Bhanwalgarh Nagaur)

मंदिर का नाम:-भंवाल माता मंदिर (Bhanwal Mata Temple)
स्थान:-भंवालगढ़, मेड़ता तहसील, नागौर, राजस्थान
समर्पित देवता:-रुद्राणी माता (काली माता) और ब्रह्माणी माता
निर्माण वर्ष:-विक्रम संवत 1119 (लगभग 1062 ईस्वी)
प्रसिद्ध त्यौहार:-नवरात्रि

भंवाल माता मंदिर भंवालगढ़ नागौर का इतिहास

भंवाल माता मंदिर प्रांगण में मिले एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण विक्रम संवत 1119 (लगभग 1062 ईस्वी) में हुआ था। हालाँकि, एक अन्य मान्यता के अनुसार मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 350 माघ बड़ी एकादशी (लगभग 293 ईस्वी) को हुई थी।

मंदिर से जुड़ी लोककथाएँ और किंवदंतियाँ

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भंवाल माता मंदिर की पहचान दो प्रमुख लोककथाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। पहली लोककथा के अनुसार भंवाल माता प्राचीन काल में भंवालगढ़ गाँव में एक खेजड़ी के पेड़ के नीचे धरती से स्वयं प्रकट हुई थीं। दूसरी और अधिक प्रचलित कहानी मंदिर के डाकुओं द्वारा निर्माण से संबंधित है। कहा जाता है कि एक समय डाकुओं के एक दल को राजा की सेना ने घेर लिया था। मृत्यु को निकट देख, उन्होंने माता को याद किया था।

माता ने अपने प्रताप से डाकुओं को भेड़-बकरियों के झुंड में बदल दिया, जिससे उनके प्राण बच गए थे। कृतज्ञता में, डाकुओं ने देवी के लिए एक मंदिर बनवाने का निर्णय लिया था। लोककथा के अनुसार, उस समय उनके पास प्रसाद के लिए केवल शराब थी, जिसे उन्होंने सच्चे मन से माता को अर्पित किया था। इस घटना को मंदिर में “ढाई प्याला मदिरा” के अनूठे भोग की प्रथा का मूल माना जाता है।

भंवाल माता मंदिर भंवालगढ़ नागौर की वास्तुकला और संरचना

भंवाल माता मंदिर की स्थापत्य कला इसकी प्राचीनता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है। मंदिर का निर्माण प्राचीन हिन्दू स्थापत्य शैली का अनुसरण करता है, जिसमें तराशे गए पत्थरों को आपस में जोड़कर संरचना का निर्माण किया गया है, और सीमेंट जैसे किसी भी आधुनिक तत्व का उपयोग नहीं किया गया है।

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मंदिर के चारों ओर और प्रवेश द्वार पर देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं और कारीगरी की गई है। प्रवेश द्वार पर उकेरी गई पौराणिक आकृतियां और फूलों की नक्काशी उस युग की समृद्ध कलात्मक परंपरा और धार्मिक भावना का प्रतिबिंब हैं। इसकी वास्तुकला में एक और रहस्यमयी तत्व मंदिर के ऊपरी भाग में बना एक गुप्त कक्ष है, जिसे गुफा भी कहा जाता है। इस कक्ष के द्वार को एक भारी पत्थर का उपयोग करके बंद किया जाता था।

मंदिर के गर्भगृह में दो प्रतिमाएँ एक साथ स्थापित हैं। बाईं ओर, भंवाल माता, जिन्हें काली माता का स्वरूप माना जाता है, विराजमान हैं, जबकि दाईं ओर ब्रह्माणी माता की प्रतिमा है। तथा मंदिर परिसर में कालाज़ी गोराज़ी तथा शीतला माता की प्रतिमा भी स्थापित है।

भंवाल माता मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित मूर्ति
भंवाल माता मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित मूर्ति

भंवाल माता मंदिर भंवालगढ़ नागौर धार्मिक प्रथाएँ और उपासना

इस मंदिर की सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी प्रथा माता काली को “ढाई प्याला मदिरा” का भोग लगाना है। भक्तों का मानना है कि माता उसी भक्त का भोग स्वीकार करती हैं जिसकी मनोकामना पूरी होनी होती है और जो इसे सच्चे दिल से अर्पित करता है। प्रसाद चढ़ाने की विधि भी अनोखी है। पुजारी एक चांदी के प्याले में मदिरा भरकर देवी के होठों तक ले जाते हैं। इस दौरान पुजारी अपनी आँखें बंद रखते हैं और देवी के मुख की ओर देखना वर्जित होता है।

इस प्रथा में एक महत्वपूर्ण विवरण भैरव बाबा का स्थान भी है। यह कहा जाता है कि काली माता के ढाई प्याले मदिरा के भोग के बाद, प्याले में बचा हुआ आधा भाग भैरव बाबा को अर्पित किया जाता है। नवरात्रि के दौरान भंवाल माता मंदिर में एक विशेष उत्सव और मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त जुटते हैं। इस दौरान विशेष पूजा, हवन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।

भंवाल माता मंदिर भंवालगढ़ नागौर तक कैसे पहुँचें?

मंदिर का स्थान: भंवाल माता मंदिर राजस्थान के नागौर जिले की मेड़ता तहसील में भंवालगढ़ गांव में स्थित है, जो मेड़ता शहर से 25 किलोमीटर और नागौर से लगभग 40 किलोमीटर दूर मेड़ता-नागौर मार्ग पर है।

मंदिर तक पहुंचने का विकल्प इस प्रकार है:

  • हवाई मार्ग: जोधपुर हवाई अड्डा (Jodhpur Airport) मंदिर से लगभग 129 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई अड्डे से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
  • रेल मार्ग: मंदिर का नजदीकी रेलवे स्टेशन मेड़ता रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 35 से 40 किलोमीटर दूर है। रेलवे स्टेशन से आप ऑटो, टैक्सी या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
  • सड़क मार्ग: मंदिर नागौर से लगभग 104 किलोमीटर दूर है। यात्री टैक्सी, बस या अन्य सड़क परिवहन सेवाएँ लेकर नागौर पहुँच सकते हैं। नागौर पहुँचने के बाद आप स्थानीय टैक्सी, ऑटो-रिक्शा या बस से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।

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