राजस्थान की पवित्र धरती पर बसे मंदिर न केवल आध्यात्मिक शांति के केंद्र हैं, बल्कि इसकी समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक भी हैं। पाली जिले के देसूरी तहसील में अरावली पहाड़ियों की तलहटी में बसा सोनाणा खेतलाजी मंदिर ऐसा ही एक तीर्थस्थल है, जो खेतलाजी (काला-गोरा भैरूजी) को समर्पित है।
खेतलाजी को क्षेत्रपाल और कुल रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है, जो भक्तों को आंधी-तूफान, प्राकृतिक आपदाओं और बुराइयों से बचाते हैं। इस मंदिर की एक अनूठी परंपरा है कि यहाँ का प्रसाद (चूरमा भोग) मंदिर परिसर में ही खाना होता है, इसे बाहर ले जाना निषिद्ध है।
सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली (Sonana Khetlaji Temple Pali)
| मंदिर का नाम:- | सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली |
| स्थान:- | सारंगवास (नवी धाम), देसूरी तहसील, पाली जिला, राजस्थान |
| समर्पित देवता:- | खेतलाजी (काला-गोरा भैरूजी), क्षेत्रपाल और कुल रक्षक देवता |
| निर्माण वर्ष:- | लगभग 800 वर्ष पुराना (~10वीं शताब्दी, संवत 1000); चौहान शासन के दौरान |
| प्रसिद्ध त्यौहार:- | चैत्र नवरात्रि मेला |
सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली का इतिहास
सोनाणा खेतलाजी मंदिर का इतिहास लगभग 800 वर्ष पुराना है, जो 10वीं शताब्दी (संवत 1000) के आसपास नाडोल में चौहान शासन के दौरान शुरू होता है। खेतलाजी, जिन्हें काला-गोरा भैरूजी के रूप में पूजा जाता है, की उत्पत्ति काशी (वाराणसी) से मानी जाती है। किंवदंती के अनुसार, खेतलाजी की पूजा पहले मंडोर (जोधपुर) में हुई, फिर तीकी पहाड़ी (सोनाणा, जूनी धाम) में, और अंततः सारंगवास (नवी धाम) में उनकी स्थापना हुई थी।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, खेतलाजी ने पुजारी केदारिया परिवार को स्वप्न में दर्शन दिए और तीकी पहाड़ी की एक गुफा में अपनी पूजा की आज्ञा दी। पुजारी परिवार ने सोनाणा में मंदिर की स्थापना की, और बाद में, जब वे सारंगवास गाँव में बसे, तो खेतलाजी की प्रतिमा को माँ ब्राह्मणी के साथ वहाँ स्थानांतरित किया गया। यह स्थानांतरण मंदिर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह खेतलाजी की क्षेत्रपाल के रूप में भूमिका को और मजबूत करता है।
मंदिर का ऐतिहासिक महत्व “नैणसी री ख्यात” और स्थानीय शिलालेखों में दर्ज है, जो खेतलाजी की पूजा और चौहान शासन के दौरान उनकी लोकप्रियता को दर्शाते हैं। मंदिर ने न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक एकता को भी बढ़ावा दिया, क्योंकि यह राजपुरोहित और अन्य 36 समुदायों (कोम) की आस्था का केंद्र बना। मंदिर की प्राचीनता और खेतलाजी की चमत्कारी कथाएँ इसे राजस्थान के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक बनाती हैं।
सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली की वास्तुकला और संरचना
सोनाणा खेतलाजी मंदिर की वास्तुकला प्राकृतिक और पारंपरिक शिल्पकला का अनूठा मिश्रण है। मंदिर अरावली पहाड़ियों की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है, जो इसे एक रहस्यमयी और आध्यात्मिक आकर्षण प्रदान करता है। सोनाणा (जूनी धाम) में तीकी पहाड़ी की गुफा और सारंगवास (नवी धाम) में नाग रूपी गुफा मंदिर की प्रमुख विशेषताएँ हैं। गुफा में खेतलाजी की काला-गोरा भैरूजी की ऊँची मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिनके साथ माँ ब्राह्मणी, माँ चामुंडा, और अन्य देवताओं की प्रतिमाएँ हैं।

मंदिर परिसर में ध्वजा चढ़ाने की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। भक्त अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने पर ध्वजा अर्पित करते हैं, जो मंदिर की शोभा बढ़ाती है। पास में एक नदी और माता सती की समाधि (पुजारी केदारिया परिवार की पूर्वज) भी है, जो मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को और बढ़ाती है। मंदिर की प्राकृतिक सेटिंग, जिसमें हरियाली और पहाड़ी दृश्य शामिल हैं, इसे शांत और आध्यात्मिक बनाती है।
सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
सोनाणा खेतलाजी मंदिर का धार्मिक महत्व इसके क्षेत्रपाल स्वरूप से जुड़ा है। खेतलाजी को काला-गोरा भैरूजी के रूप में पूजा जाता है, जो गाँव, कुल, और खेती की रक्षा करते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि खेतलाजी आंधी-तूफान, प्राकृतिक आपदाओं, और बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। मंदिर में खेतलाजी के साथ भगवान गणेश, हनुमान, माँ ब्राह्मणी, और माँ चामुंडा की भी पूजा होती है, जो इसे एक समग्र आध्यात्मिक केंद्र बनाता है।
मंदिर की सबसे अनूठी परंपरा है प्रसाद का नियम। यहाँ चूरमा भोग को मंदिर परिसर में ही खाना होता है, और इसे बाहर ले जाना निषिद्ध है। यह परंपरा खेतलाजी की पवित्रता और भक्तों के प्रति उनके अनुशासन को दर्शाती है। चैत्र नवरात्रि में मंदिर विशेष रूप से जीवंत हो उठता है, जब यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है। इस मेले में कालबेलिया नृत्य, गेर नृत्य, और भक्ति भजनों का आयोजन होता है, जो हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
सांस्कृतिक रूप से, मंदिर राजपुरोहित और 36 कोम (समुदायों) की एकता का प्रतीक है। यहाँ की परंपराएँ, जैसे डांडिया और गेर नृत्य, राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवंत करती हैं। खेतलाजी की पूजा न केवल पाली, बल्कि जोधपुर, उदयपुर, और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी प्रचलित है। मंदिर में सालाना लाखों रुपये का चढ़ावा आता है, जो ट्रस्ट द्वारा धर्मशाला, भोजनालय, और श्रद्धालु सुविधाओं के लिए उपयोग होता है। यह मंदिर राजस्थान की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल हिस्सा है।
सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली तक कैसे पहुँचें?
पता: सोनाणा खेतलाजी मंदिर पाली जिले के देसूरी तहसील में सारंगवास (नवी धाम) में स्थित है। जो देसूरी से लगभग 7 किलोमीटर, सादड़ी से लगभग 18 किलोमीटर, और पाली से लगभग 60 किलोमीटर दूर है।
मंदिर तक सड़क, रेल, और हवाई मार्ग से पहुँचा जा सकता है:
- सड़क मार्ग: सड़क मार्ग मंदिर तक पहुँचने का सबसे सुविधाजनक और लोकप्रिय तरीका है, क्योंकि यह पाली, उदयपुर, और जोधपुर जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा है। पाली से यह 60 किलोमीटर दूर है, और 1.5-2 घंटे में पहुँचा जा सकता है।
- रेल मार्ग: रेल यात्रा उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो लंबी दूरी की यात्रा ट्रेन से करना पसंद करते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन रानी और फालना हैं। रानी रेलवे स्टेशन (लगभग 21 किलोमीटर) या फालना (लगभग 40 किलोमीटर) से टैक्सी या बस से मंदिर पहुँचा जा सकता है।
- हवाई मार्ग: हवाई यात्रा उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो लंबी दूरी से आ रहे हैं और समय बचाना चाहते हैं। निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर में महाराणा प्रताप हवाई अड्डा है। उदयपुर हवाई अड्डा लगभग 120 किलोमीटर दूर है, यहाँ से टैक्सी लेकर लगभग 2.5-3 घंटे में पहुँचा जा सकता है। जोधपुर हवाई अड्डा (लगभग 140 किलोमीटर) दूसरा विकल्प है।
