माउंट आबू, राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन, न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत जलवायु के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ स्थित अर्बुदा देवी मंदिर भी इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाता है। अर्बुदा देवी मंदिर, जिसे अधर देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर माता कात्यायनी, जो माता दुर्गा का छठा रूप हैं, और अधर देवी को समर्पित है। अरावली पर्वतमाला की ऊँची चोटी पर प्राकृतिक गुफा में बसा यह मंदिर भक्तों और पर्यटकों के लिए एक अनूठा आकर्षण है। मंदिर तक पहुँचने के लिए 365 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
अर्बुदा देवी मंदिर माउंट आबू (Arbuda Devi Temple Mount Abu)
मंदिर का नाम:- | अर्बुदा देवी मंदिर (अधर देवी मंदिर) |
स्थान:- | माउंट आबू, सिरोही जिला, राजस्थान (माउंट आबू शहर से 3 किलोमीटर) |
समर्पित देवता:- | माता कात्यायनी (दुर्गा का छठा रूप) और अधर देवी |
निर्माण वर्ष:- | ज्ञात नहीं (प्राचीन मंदिर) |
मुख्य आकर्षण:- | प्राकृतिक गुफा में मंदिर, 365 सीढ़ियों का रास्ता |
प्रसिद्ध त्यौहार:- | नवरात्रि |
अर्बुदा देवी मंदिर माउंट आबू का इतिहास
अर्बुदा देवी मंदिर एक प्राचीन मंदिर है, जिसका इतिहास सदियों पुराना है। हालांकि, इसके निर्माण की सटीक तिथि अभी तक ज्ञात नहीं हो पाई है। यह मंदिर हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी पत्नी सती की मृत्यु के बाद उनके शरीर को लेकर तांडव नृत्य कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया। इस दौरान सती के होंठ (अधर) माउंट आबू में गिरे, जिसके कारण इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता मिली।
माउंट आबू, जिसका प्राचीन नाम अर्बुद है, का नामकरण भी एक रोचक कथा से जुड़ा हुआ है। पुराणों में इस क्षेत्र को अर्बुदारण्य (“अर्बुद का वन”) कहा गया है , और ‘आबू’ इसी प्राचीन नाम का संक्षिप्त रूप है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, अर्बुद नामक एक शक्तिशाली सर्प (नाग) ने भगवान शिव के वाहन नंदी की जान बचाई थी। इस महत्वपूर्ण घटना के सम्मान में इस पर्वत का नाम अर्बुदारण्य रखा गया, जो समय के साथ आबू के रूप में जाना जाने लगा। एक अन्य किंवदंती यह भी बताती है कि ऋषि वशिष्ठ ने माउंट आबू के शिखर पर एक यज्ञ किया था ताकि पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए देवताओं से सहायता प्राप्त की जा सके।
परमार राजवंश, जिन्होंने 9वीं से 14वीं शताब्दी तक पश्चिम-मध्य भारत के मालवा और आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया, का अर्बुदा देवी मंदिर से गहरा संबंध माना जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि परमार शासकों की उत्पत्ति माउंट आबू के ‘अग्निकुंड’ से हुई थी, और अर्बुदा देवी उनकी कुलदेवी के रूप में पूजी जाती थीं। अग्निकुंड की कथा, जो परमारों की उत्पत्ति को माउंट आबू से जोड़ती है, इस राजवंश की अर्बुदा देवी के प्रति गहरी भक्ति का एक मजबूत पौराणिक आधार प्रदान करती है। यह संभावना है कि उनके शासन के दौरान मंदिर को महत्वपूर्ण समर्थन और मान्यता मिली होगी। माउंट आबू क्षेत्र पर 10वीं शताब्दी के अंत से 13वीं शताब्दी के अंत तक परमारों की चंद्रावती शाखा का शासन था, जिसकी राजधानी चंद्रावती थी।
अर्बुदा देवी मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाओं का सारांश
किंवदंती | विवरण |
---|---|
सती का अधर गिरना | जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर घूम रहे थे, तो उनका होंठ इस स्थान पर गिरा, जिससे यह एक शक्तिपीठ बन गया और इसे “अधर देवी” नाम मिला। |
सर्प अर्बुद द्वारा नंदी को बचाना | सर्प अर्बुद ने भगवान शिव के बैल नंदी को वापस मैदानों में चढ़ने में मदद की। इस श्रद्धा के रूप में मंदिर का निर्माण किया गया, और पर्वत का नाम भी सर्प के नाम पर रखा गया, जो अंततः माउंट आबू बन गया। |
अर्बुदा देवी द्वारा बुरी शक्तियों से रक्षा | देवी अर्बुदा यहाँ क्षेत्र को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए प्रकट हुईं, और उनकी उपस्थिति इस क्षेत्र को आशीर्वाद देती रहती है। |
अग्निकुंड से परमारों की उत्पत्ति | ऋषि वशिष्ठ ने माउंट आबू पर एक यज्ञ किया, जिससे पहले परमार पूर्वज प्रकट हुए। अर्बुदा देवी को परमार क्षत्रियों की कुलदेवी माना जाता है। |
अर्बुदा देवी मंदिर माउंट आबू की वास्तुकला और संरचना
अर्बुदा देवी मंदिर एक विशाल चट्टान को काटकर बनाई गई एक गुफा है, जो भारत में रॉक-कट मंदिरों के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। पूरा मंदिर एक ही विशाल ठोस चट्टान से निर्मित है। मंदिर के गर्भगृह तक एक संकरी गुफा से पहुँचा जा सकता है।
मंदिर तक पहुँचने के लिए 365 खड़ी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, जिन्हें अक्सर वर्ष के दिनों का प्रतीक माना जाता है। यह चढ़ाई भक्तों के लिए एक शारीरिक और आध्यात्मिक चुनौती दोनों है। गुफा के अंदर देवी दुर्गा की एक प्राचीन और प्रसिद्ध मूर्ति स्थापित है, जिसे अर्बुदा देवी के रूप में पूजा जाता है।
कुछ स्रोतों के अनुसार, मूर्ति काले रंग के चित्रित संगमरमर की है और सोने के बाघ पर सवार है। मूर्ति को कृष्ण वर्ण का माना जाता है, जिसका मुख चांदी से चमकता है और सिर पर सोने का मुकुट है। यह मूर्ति ऐसी दिखती है जैसे बिना किसी सहारे के हवा में खड़ी हो। मंदिर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जो आसपास के अरावली पर्वतमाला का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है।
अर्बुदा देवी मंदिर माउंट आबू में सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है और पूरे वर्ष भक्तों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। इसे शक्तिपीठ माना जाता है , जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। नवरात्रि इस मंदिर का प्रमुख त्योहार है, जिसके दौरान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
अर्बुदा देवी को माउंट आबू की संरक्षिका देवी माना जाता है। मंदिर के पास दूध बावड़ी नामक एक पवित्र कुआँ है, जिसके पानी को दिव्य शक्तियों से युक्त माना जाता है। स्थानीय लोग इसे कामधेनु का रूप मानते हैं और यह मंदिर के पानी का मुख्य स्रोत है। दूध बावड़ी को कामधेनु (पवित्र गाय) का रूप मानना स्थानीय मान्यताओं और मंदिर के सांस्कृतिक संदर्भ में जल संसाधनों के महत्व को दर्शाता है।
अर्बुदा देवी मंदिर माउंट आबू तक कैसे पहुँचें?
मंदिर का स्थान: अर्बुदा देवी मंदिर, जिसे अधर देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, माउंट आबू, सिरोही जिला, राजस्थान में स्थित एक पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल है।
अर्बुदा देवी मंदिर तक पहुंचने के विकल्प इस प्रकार है:
- हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर का महाराणा प्रताप हवाई अड्डा है, जो माउंट आबू से लगभग 178 किलोमीटर दूर है। उदयपुर से माउंट आबू तक टैक्सी या बस से 4-5 घंटे में पहुंचा जा सकता है। वैकल्पिक रूप से, अहमदाबाद का सरदार वल्लभभाई पटेल हवाई अड्डा (लगभग 230 किलोमीटर) भी उपयोग किया जा सकता है।
- रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन आबू रोड है, जो माउंट आबू से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर है। स्टेशन से माउंट आबू तक टैक्सी या बस से पहुंचा जा सकता है।
- सड़क मार्ग: माउंट आबू राष्ट्रीय राजमार्ग 62 और राज्य राजमार्गों के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा है।
माउंट आबू शहर में पहुंचने के बाद, मंदिर तक पहुंचने के लिए:
- ऑटो-रिक्शा या टैक्सी: मंदिर माउंट आबू बस स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर और नक्की झील से लगभग 1.8 किलोमीटर दूर है। ऑटो-रिक्शा या टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।
- पैदल: फिट यात्री मंदिर तक पैदल जा सकते हैं, जो एक सुंदर अनुभव हो सकता है।
- सीढ़ियों की चढ़ाई: मंदिर तक पहुंचने के लिए 365 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, जो पहाड़ी में काटी गई हैं। गर्भगृह तक एक संकरी गुफा से पहुंचा जाता है।