भगवत गीता अध्याय 1 श्लोक 27
यहां पर भगवत गीता के अध्याय 1 के श्लोक 27 का विस्तार से वर्णन किया गया है:
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥27॥
श्लोक का अनुवाद
जब अर्जुन ने दोनों सेनाओं में अपने श्वसुरों और मित्रों को भी खड़ा देखा, तो वे अत्यधिक करुणा से भर गए और दुखी होकर कहने लगे।
श्लोक की व्याख्या
यह श्लोक पिछले श्लोक 26 का ही विस्तार है। अर्जुन ने रिश्तों की अपनी खोज पूरी की। उन्होंने देखा कि युद्ध के मैदान में केवल भाई या गुरु ही नहीं, बल्कि ससुर (जैसे द्रुपद, शल्य आदि) और सुहृद (घनिष्ठ मित्र) भी खड़े हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अर्जुन को यह अहसास हुआ कि दोनों सेनाओं (कौरव और पांडव) में हर तरफ केवल उनके ‘बन्धु’ (रिश्तेदार) ही मौजूद हैं।
उन्हें मारने वाला भी अपना है और मरने वाला भी अपना। इस दृश्य ने अर्जुन को पूरी तरह से घेर लिया कि यह युद्ध किसी बाहरी दुश्मन से नहीं, बल्कि अपनों के बीच ही हो रहा है।
