भगवत गीता अध्याय 1 श्लोक 28
यहां पर भगवत गीता के अध्याय 1 के श्लोक 28 का विस्तार से वर्णन किया गया है:
अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत् ।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥28॥
श्लोक का अनुवाद
अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! जब मैं अपने इस स्वजन समूह को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देख रहा हूँ।
श्लोक की व्याख्या
यह श्लोक एक बड़ा मोड़ है। पिछले श्लोकों में हमने देखा कि अर्जुन एक निडर योद्धा की तरह तैयार थे, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने दादा, गुरु और भाइयों को सामने देखा, उनके भीतर अचानक बदलाव आया। संजय बताते हैं कि अर्जुन ‘परया कृपया’ यानी अत्यधिक करुणा या दया से भर गए।
यह करुणा एक कमजोरी के रूप में आई, जिसने उनके योद्धा स्वभाव को दबा दिया। दुखी होकर अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा कि “हे कृष्ण, मेरे सामने मेरे अपने ही लोग (स्वजन) एक-दूसरे को मारने के लिए खड़े हैं।” अपनों को मारने का विचार आते ही अर्जुन का शरीर और मन कांपने लगा।
