भीमाशंकर मंदिर, भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। पुणे, महाराष्ट्र में स्थित यह पवित्र तीर्थस्थल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए भी प्रसिद्ध है। घने जंगलों, भीमा नदी के उद्गम स्थल, और सह्याद्रि की पहाड़ियों के बीच यह मंदिर तीर्थयात्रियों और प्रकृति प्रेमियों दोनों को आकर्षित करता है।
भीमाशंकर मंदिर पुणे महाराष्ट्र (Bhimashankar Temple Pune Maharashtra)
मंदिर का नाम:- | भीमाशंकर मंदिर (Bhimashankar Temple) |
अन्य नाम:- | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर (Bhimashankar Jyotirling Temple) |
स्थान:- | भीमाशंकर गांव, खेड़ तालुका, पुणे जिला , महाराष्ट्र |
समर्पित देवता:- | भगवान शिव |
निर्माण वर्ष:- | प्राचीन |
प्रसिद्ध त्यौहार:- | महाशिवरात्रि, सावन मास |
भीमाशंकर मंदिर पुणे महाराष्ट्र का इतिहास
भीमाशंकर मंदिर का इतिहास पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं का एक रोचक मिश्रण है।
पौराणिक कथा और लोककथा
भीमाशंकर मंदिर का इतिहास पौराणिक कथाओं और लोककथाओं में गहराई से निहित है, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को दर्शाती हैं।
कुंभकर्ण के पुत्र भीमा की कथा और शिव का अवतार
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी सबसे प्रमुख पौराणिक कथा शिव पुराण में विस्तार से वर्णित है। इस कथा के अनुसार, लंकापति रावण के भाई कुंभकर्ण और उसकी पत्नी कर्कटी का एक पराक्रमी पुत्र था, जिसका नाम भीमा था। भीमा का जन्म उसके पिता की मृत्यु के बाद हुआ था, जो भगवान राम के हाथों हुई थी। जब भीमा को अपने पिता की मृत्यु का ज्ञान हुआ, तो वह क्रोध से भर उठा और भगवान राम से प्रतिशोध लेने के लिए कठोर तपस्या में लीन हो गया था।
उसकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने उसे असीम शक्ति और युद्ध में अजेय होने का वरदान प्रदान किया। वरदान प्राप्त करने के बाद, भीमा अहंकारी और क्रूर हो गया। उसने पृथ्वी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, ऋषियों और साधु-संतों को परेशान किया, और सभी यज्ञ तथा धार्मिक कार्यों को बलपूर्वक बंद करवा दिया। उसने कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को भी पराजित कर बंदी बना लिया, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। कारागृह में भी, राजा सुदक्षिण ने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी और पार्थिव शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की अनवरत आराधना जारी रखी।
जब दुष्ट भीमा ने राजा सुदक्षिण के पार्थिव शिवलिंग पर अपनी तलवार से प्रहार करने का प्रयास किया, तो उसी क्षण शिवलिंग से साक्षात भगवान शिव प्रकट हुए। शिव और भीमा के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें अंततः भगवान शिव ने राक्षस भीमा का वध कर उसे भस्म कर दिया। इस घटना के बाद, देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, भगवान शिव ने लोक कल्याण और उस क्षेत्र को पवित्र करने के लिए उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करना स्वीकार किया, जो भीमाशंकर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
त्रिपुरासुर वध की लोककथा
प्राचीन काल में तारकासुर के तीन पुत्र थे – तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। इन तीनों ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की और वरदान प्राप्त किया कि उन्हें कोई भी नहीं मार सकता, सिवाय तब जब तीनों एक ही बाण से मारे जाएं। इस वरदान के बल पर उन्होंने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोक में तीन भव्य नगरों का निर्माण किया, जिन्हें “त्रिपुर” कहा गया। ये नगर सोने, चांदी और लोहे के थे, और अपनी अद्भुत वास्तुकला तथा गतिशीलता के कारण अद्वितीय थे।
इन त्रिपुरों के स्वामी बनने के बाद, तारकासुर के पुत्रों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। वे देवताओं और ऋषियों को परेशान करने लगे, यज्ञों को भंग करने लगे और चारों ओर हाहाकार मचा दिया। उनके अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता ब्रह्माजी और भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए पहुँचे।
जब कोई उपाय न सूझा, तो सभी देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार की और त्रिपुरासुरों का वध करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने एक असाधारण रथ का निर्माण किया। पृथ्वी रथ बनी, सूर्य और चंद्रमा उसके पहिये, ब्रह्मा सारथी बने, मेरु पर्वत धनुष बना, शेषनाग प्रत्यंचा बने और भगवान विष्णु बाण बने।
जब तीनों पुर एक सीध में आए, तो भगवान शिव ने अपने पिनाक धनुष से एक ही बाण छोड़ा। वह बाण इतना शक्तिशाली था कि उसने तीनों पुरों को एक साथ भस्म कर दिया। इसी घटना को “त्रिपुरासुर वध” के नाम से जाना जाता है। इस विजय के बाद भगवान शिव “त्रिपुरारी” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
त्रिपुरासुर वध के पश्चात भगवान शिव ने कुछ समय के लिए विश्राम किया। इस कथा के अनुसार, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और इसे त्रिपुरासुर वध से जोड़ा जाता है। इस प्रकार, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के त्रिपुरासुर वध से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो उनकी महिमा और भक्तों के प्रति उनकी करुणा को दर्शाती है। यह स्थान शिव भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।
भीमा नदी का उद्गम
भीमा नदी का उद्गम भीमाशंकर मंदिर के निकट सह्याद्री पर्वत श्रेणी पर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव और राक्षस भीमा के बीच हुए भयंकर युद्ध के बाद, भगवान शिव के शरीर से निकले पसीने की बूंदों से भीमा नदी का उद्भव यहीं से हुआ था। मंदिर से लगभग 50 मीटर दूर सीढ़ियों के पास एक छोटा ‘कुंड’ (पानी का कुआँ) है, जिसे भीमा नदी का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है। भीमा नदी का उद्गम स्वयं भगवान शिव के शरीर से होना, इसे एक साधारण नदी से कहीं अधिक पवित्र बनाता है।
ऋषि कौशिक और मोक्ष कुंड की कहानी
मोक्ष कुंड मुख्य भीमाशंकर मंदिर से लगभग 500 मीटर दूर स्थित एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह वह स्थान है जहाँ प्राचीन काल में ऋषि कौशिक ने लंबी तपस्या की थी। एक कथा के अनुसार, ऋषि कौशिक के शिष्य रुचक के पूर्वजों को अविवाहित जीवन बिताने के कारण मुक्ति प्राप्त नहीं हुई थी। रुचक ने अपने गुरु से सहायता की प्रार्थना की। ऋषि कौशिक ने अपने कमंडल से एक कुंड का निर्माण किया, और उनकी तपस्या के सम्मान में, भीमा नदी इस कुंड में प्रकट हुई। इस कुंड में स्नान करने से रुचक के पूर्वजों को अंततः मुक्ति प्राप्त हुई। मोक्ष कुंड की यह कथा भीमाशंकर को केवल एक ज्योतिर्लिंग स्थल से कहीं अधिक बनाती है; यह इसे मुक्ति, पूर्वजों के आशीर्वाद और आध्यात्मिक शुद्धि के स्थान के रूप में प्रस्तुत करती है।
ऐतिहासिक विकास और संरक्षक
भीमाशंकर मंदिर का इतिहास सदियों के विकास और विभिन्न शासकों के संरक्षण से चिह्नित है, जिन्होंने इसके वर्तमान स्वरूप को आकार दिया है।
मंदिर का निर्माण काल और प्रारंभिक इतिहास
भीमाशंकर को एक प्राचीन तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है। 13वीं शताब्दी के लेखों में भी इस मंदिर और भीमा नदी का उल्लेख मिलता है। हालांकि, मंदिर की वर्तमान संरचना अपेक्षाकृत नई प्रतीत होती है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण महाभारत काल के दौरान पांडवों ने किया था। अन्य स्रोत बताते हैं कि इसका निर्माण लगभग 13वीं शताब्दी में हुआ था। हेमाडपंथी शैली में निर्मित इस मंदिर का मूल ढाँचा लगभग 1200 से 1400 वर्ष पुराना माना जाता है। मंदिर के निर्माण काल के संबंध में विभिन्न विवरण, जैसे महाभारत काल, 13वीं शताब्दी, और 1200-1400 वर्ष पुराना होना, निरंतर पूजा, नवीनीकरण और संभवतः पुनर्निर्माण के एक लंबे इतिहास को इंगित करता है। यह दर्शाता है कि जबकि स्थल की पवित्रता प्राचीन है, इसका भौतिक स्वरूप सहस्राब्दियों से विकसित हुआ है, जो बदलती स्थापत्य शैलियों और भक्तों तथा शासकों की इसके रखरखाव के प्रति स्थायी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ और संबंधित व्यक्ति
भीमाशंकर मंदिर को मराठा शासकों का महत्वपूर्ण संरक्षण प्राप्त था। महान मराठा शासक शिवाजी ने इस मंदिर में पूजा के लिए कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की थीं। उन्होंने खरौसी गाँव को मंदिर को दान किया था ताकि दैनिक धार्मिक अनुष्ठानों का वित्तपोषण हो सके। छत्रपति राजाराम महाराज और पेशवा बालाजी विश्वनाथ के भी यहाँ दर्शन के लिए आने के अभिलेख मिलते हैं।
पेशवा काल के प्रसिद्ध राजनेता नाना फड़नवीस का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने 18वीं शताब्दी में मंदिर के भव्य सभामंडप और शिखर का निर्माण करवाया था । चिमाजी अप्पा द्वारा 1729 में दान की गई विशाल घंटी भी उनके संरक्षण का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है । शिवाजी महाराज, नाना फड़नवीस और चिमाजी अप्पा जैसे प्रमुख मराठा हस्तियों का संरक्षण मराठा साम्राज्य के राजनीतिक और धार्मिक परिदृश्य में मंदिर की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।
भीमाशंकर मंदिर पुणे महाराष्ट्र की वास्तुकला और संरचना
भीमाशंकर मंदिर की वास्तुकला मुख्य रूप से नागर शैली में निर्मित है, जो उत्तर भारत में प्रचलित है। इस शैली की विशेषता ऊँचे शिखर होते हैं जो ऊपर की ओर पतले होते जाते हैं। मंदिर का निर्माण काले पत्थरों का उपयोग करके किया गया है। इसका शिखर अत्यंत भव्य और कलात्मक है।
मंदिर का मुख्य भाग गर्भगृह है, जहाँ भगवान शिव का दिव्य ज्योतिर्लिंग स्थापित है। गर्भगृह के आसपास एक विस्तृत प्रांगण है, जहाँ भक्त पूजा-अर्चना करने आते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सुशोभित मूर्तियाँ और नक्काशी की गई हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर की गई शिल्पकला भी अत्यंत सुंदर और आकर्षक है। मंदिर की वास्तुकला में प्राचीन और नवीन नागर शैली की संरचनाओं का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है। यह निरंतर नवीनीकरण और सदियों से अनुकूलन को दर्शाता है।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का शिवलिंग काफी मोटा है, जिसके कारण इसे ‘मोटेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है। मंदिर के पास दो कुंड भी स्थित हैं। मंदिर के सभामंडप के बाहर लगभग पाँच मन (लगभग 200 किलोग्राम) वजनी एक विशाल लोहे की घंटी लगी हुई है। इस घंटी को पेशवा काल के प्रसिद्ध राजनेता नाना फड़नवीस ने लगवाया था। यह घंटी चिमाजी अप्पा, जो बाजीराव प्रथम के भाई थे, द्वारा 1729 में भेंट की गई थी।
यह घंटी उन कई चर्च की घंटियों में से एक है जिसे चिमाजी अप्पा और उनकी सेना ने फरवरी 1739 में पुर्तगालियों को हराने के बाद वसई किले से स्मृति चिन्ह के रूप में लाया था। इसी प्रकार की घंटियाँ नासिक में खंडोबा मंदिर और नारो शंकर मंदिर में भी पाई जाती हैं।
कुछ लोककथाओं के अनुसार, भीमाशंकर मंदिर का आकार एक रथ के समान है, इसलिए इसे ‘रथचला’ भी कहा जाता है। मंदिर के समीप ही कमलजा मंदिर भी स्थित है, जो देवी पार्वती का एक अवतार है।
भीमाशंकर मंदिर पुणे महाराष्ट्र तक कैसे पहुँचें?
मंदिर का स्थान: भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर, महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र तीर्थ स्थल है। यह सह्याद्री पर्वत श्रृंखला के घाट क्षेत्र में, पुणे से लगभग 125 किलोमीटर और खेड से लगभग 50 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में भीमाशंकर गाँव में स्थित है।
मंदिर तक पहुंचने के विकल्प इस प्रकार है:
- सड़क मार्ग: सड़क मार्ग से भीमाशंकर मंदिर तक पहुँचने का सबसे सुविधाजनक और आम तरीका है। पुणे से भीमाशंकर की दूरी लगभग 110-125 किलोमीटर है। आप बस, टेक्सी या अन्य स्थानीय परिवहन से मंदिर तक पहुंच सकते है।
- रैल मार्ग: भीमाशंकर का निकटतम रेलवे स्टेशन पुणे जंक्शन है। यह भीमाशंकर मंदिर से लगभग 125 किलोमीटर दूर स्थित है। पुणे से आप भीमाशंकर पहुंचने के लिए टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन विकल्पों का उपयोग कर सकते हैं।
- हवाई मार्ग: भीमाशंकर का निकटतम हवाई अड्डा पुणे हवाई अड्डा है। यह भीमाशंकर मंदिर से लगभग 110 किलोमीटर दूर है। हवाई अड्डे से, आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन भीमाशंकर तक जा सकते हैं।
भीमाशंकर मंदिर के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पुणे से लगभग 110 से 125 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह दूरी सड़क मार्ग से तय करनी पड़ती है, जिसमें आमतौर पर 3 से 4 घंटे का समय लगता है।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले में स्थित है। यह सह्याद्री पर्वत श्रृंखला के घने जंगलों में स्थित है।