करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर | Karni Mata Temple Deshnoke Bikaner

करणी माता मंदिर राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक गांव में स्थित है। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि हजारों चूहों, जिन्हें स्थानीय रूप से “काबा” कहा जाता है, के लिए भी अनोखा है। ये चूहे मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं और श्रद्धालुओं द्वारा पवित्र माने जाते हैं। करणी माता, जिन्हें माँ दुर्गा का अवतार माना जाता है, इस मंदिर की मुख्य देवी हैं। उनकी चमत्कारी शक्तियों और पुनर्जन्म की किंवदंतियों ने इस स्थान को विश्वभर के पर्यटकों और भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया है। इसे ‘चूहों वाला मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है

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करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर (Karni Mata Temple Deshnoke Bikaner)

मंदिर का नाम:-करणी माता मंदिर (Karni Mata Temple)
स्थान:-देशनोक, बीकानेर, राजस्थान
समर्पित देवता:-करणी माता (माता दुर्गा अवतार)
निर्माण वर्ष:-1530 के आसपास शुरू, 20वीं सदी में पूरा
मुख्य आकर्षण:-हजाराें चूहाें (काबा) की उपिस्थित, चांदी के द्वार, संगमरमर की नक्काशी
प्रसिद्ध त्यौहार:-नवरात्रि

करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर का इतिहास

करणी माता का जीवन एक साधारण तपस्विनी से लोक देवी और शक्तिशाली योद्धा-संत के रूप में उनकी स्थापना की गाथा है। उनकी कथाएं चमत्कारों, सामाजिक सुधारों और राजनीतिक प्रभाव से ओत-प्रोत हैं।

जन्म, प्रारंभिक जीवन और चमत्कारी घटनाएं

लोककथाओं के अनुसार करणी माता (जिनका जन्म का नाम रिद्धि बाईसा था) का जन्म 1387 ईस्वी (विक्रम संवत 1444) में जोधपुर के पास सुवाप नामक गाँव में चारण जाति के मेहाजी किनिया और उनकी पत्नी देवलदेवी के यहाँ हुआ था। उनका जन्म अश्विन माह में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था। उनकी मां की गर्भावस्था 21 महीने तक चली थी।

करनी माता के जन्म के समय उनकी मां देवलदेवी कुछ समय के लिए बेहोश हो जाती है, बेहोश की अवस्था में देवी दुर्गा साक्षात दर्शन देती है। होश में आने पर उनकी मां इसे भ्रम समझती है। जब करणी माता का जन्म हुआ और शिशु के रोने की आवाज मेहाजी के कानो में पड़ी, तब उन्होंने अपनी बहन को उत्सुकतावश पूछा की क्या हुआ है। उनकी जो उन दिनों पीहर आई हुई थी। उन्होंने हाथ का डूचका देते हुए कहा कि फिर पत्थर आ गया अर्थात् लडकी हुई है। इतना कहना हुआ कि उनकी पाँचों अंगुलियाँ ज्यों की त्यों जुडी हुई रह गयी और वापस नहीं खुल सकी थी।

1392-93 ईस्वी (वि.सं. 1449-50) की बात है उन दिनों श्रीकरणीजी की भुआ पीहर आयी हुई थी। भुँआजी अन्य छः बहिनों की अपेक्षा रिधू बाई को बहुत प्यार करती थी। एक दिन वे रिधू बाई को स्नान करा रही थी। एक हाथ से भूआ उनको ठीक से नहीं स्नान करा पा रही थी। तब रिधू बाई ने पूछा कि आप दोनों हाथों से क्यों नहीं स्नान करा रही है? तब भूआ ने उनके जन्म के समय की सारी घटना बताई फिर श्रीकरणीजी ने उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि आपका हाथ तो बिलकुल ठीक है। क्यों बहाना बनाती हो? यह कहना हुआ कि चूँआ का हाथ बिलकुल ठीक हो गया। उनके हाथ की अंगुलियाँ फिर से पहले जैसी हो गयी थी। भुँआ का हाथ ठीक होंने से उन्हें काफी प्रसन्नता हुई। भूआ ने अपने भाई व भाभी को इस चमत्कार की बात बताई। इस घटना के बाद भुँआ ने कहा कि इस कन्या को साधारण न समझे, यह संसार में अपनी कुछ करनी दिखलायेगी। तब भूआ ने कन्या के जन्म के नाम रिधूबाई को बदलकर करणी नाम रख दिया था। इस दिन के बाद से रिधूबाई श्रीकरणीजी के नाम से विश्व विख्यात हुई।

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वैवाहिक जीवन और आध्यात्मिक मार्ग

करणी माता का विवाह 1416 ईस्वी (वि.सं. 1473) को साटिका के जागीरदार और रोहड़िया वंश के दीपाजी से हुआ था। विदाई के बाद साटिका जाते वक्त रास्ते में देपाजी ने माता करणी का असली स्वरूप देखा — वे सिंह पर सवार, त्रिशूलधारी, दिव्य महाशक्ति के रूप में प्रकट हुईं। करणीजी ने कहा कि उनका भौतिक शरीर केवल एक माध्यम है, और वे गृहस्थ जीवन के लिए नहीं बनीं है। अपनी आध्यात्मिक यात्रा को जारी रखने के लिए उन्होंने वैवाहिक जीवन का त्याग कर दिया था। तथा अपनी बहन गुलाब बाई का विवाह दीपाजी से करवाकर उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया, और गुलाब बाई के चार पुत्रों को अपने बच्चों की तरह पाला था। इस निर्णय ने उनकी तपस्विनी के रूप में पहचान को और मजबूत किया और यह दर्शाया कि उनका उद्देश्य सांसारिक सुखों से परे था।

राजनीतिक प्रभाव और कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठा

करणी माता का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि यह राजपूताना के राजनीतिक परिदृश्य में भी गहरी पैठ रखता था। उन्होंने राव जोधा के शासनकाल में मेहरानगढ़ किले की आधारशिला रखी थी। उनके आशीर्वाद और आदेश से, राव जोधा के पुत्र राव बीका ने बीकानेर की स्थापना की और बीकानेर किले की नींव रखी थी। उनका धार्मिक कद राजपूताना के राठौड़ वंश के शासन को वैधता प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बन गया था।

किसी साधारण तपस्विनी को इतने शक्तिशाली राजाओं द्वारा सम्मान देना इस बात को प्रमाणित करता है कि उनका प्रभाव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी था। उस समय के समाज में, एक देवी के आशीर्वाद को शासक के लिए दैवीय स्वीकृति के रूप में देखा जाता था। उनकी भूमिका ने नए राज्यों की स्थापना को न केवल आध्यात्मिक रूप से अनुमोदित किया, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता भी प्रदान की थी। बीकानेर और जोधपुर के शाही परिवार आज भी उन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं।

चूहों “काबा” से जुड़ी किंवदंतियों का विमोचन

मंदिर के चूहों को लेकर कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें से दो प्रमुख हैं। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, करणी माता की बहन गुलाब बाई के सबसे छोटे पुत्र लक्ष्मण की कपिल सरोवर में डूबने से मृत्यु हो गई थी। करणी माता ने यमराज से लड़कर उसे पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की, जिस पर यमराज ने लक्ष्मण को चूहे के रूप में नया जीवन दिया था। इसी कारण यह माना जाता है कि मंदिर के सभी चूहे करणी माता के वंशज और उनके पुत्र हैं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, करणी माता ने यमराज से यह वरदान प्राप्त किया था कि उनके सभी वंशज (चारण समुदाय के सदस्य) मृत्यु के बाद चूहों के रूप में पुनर्जन्म लेंगे। इस मान्यता के अनुसार, जब इन चूहों की मृत्यु होती है, तो वे पुनः मनुष्य के रूप में करणी माता के वंश में जन्म लेते हैं। इस तरह, चूहों का अस्तित्व जीवन और मृत्यु के चक्र पर देवी के नियंत्रण को प्रतीकात्मक रूप से स्थापित करता है।

करणी माता ज्योतिर्लीन/महाप्रयाण होना

151 वर्ष की आयु में 1538 ईस्वी (वि.सं. 1595) में उन्होंने देशनोक के पास धिनेरू तलाई में महाप्रयाण किया, जहां माना जाता है कि एक तेजस्वी प्रकाश उनके शरीर से निकला था।

बूगटी से श्रीकरणीजी देशनोक के लिए रवाना हुई तथा गडियाला और गिराछर के बीच धीनेरु की तलाई के पास पहुँचकर अपने रथ को रोक लिया। यह वही स्थान था जिसके लिए बीकानेर और जैसलमेर राज्यों के बीच सीमा सम्बन्धी विवाद चल रहा था और श्रीकरणीजी ने पंचों को वचन दिया था कि वे वहाँ महाप्रयाण करेगी। श्रीकरणीजी ने सोचा कि उनके अवतार के सारे कार्य पूरे हो चुके हैं तथा उनकी आयु भी 150 वर्ष से अधिक हो चुकी है अत उन्हें अब अपना भौतिक शरीर छोड देना चाहिए।

सूर्योदय का समय था। श्रीकरणीजी ने स्नान करने की इच्छा प्रकट की और अपने पुत्र पुण्यराज को रथ के नीचे से घड़ा निकालने को कहा। पुण्यराज ने घड़ा देखा तो खाली था उनहोंने माताजी से निवेदन किया कि घड़ा तो खाली है। इस पर श्रीकरणीजी ने अपने सेवक की उपस्थिति में पुण्यराज को आदेश दिया कि जाओ धीनेरू (खराढ्या) तलाई से घडा भर लाओ। पुण्यराज घडा भरने के लिए चले गये। पीछे से श्रीकरणीजी ने रथवान सारंगिया विश्नोई को कहा कि मेरी झारी निकालो, उसमें कुछ पानी है।

सारंगिया ने झारी निकाली उसमें कुछ पानी था। श्रीकरणीजी ने उससे कहा कि उसमें जो पानी है वह मेरे शरीर पर उडेल दो। यह कहकर श्रीकरणीजी वहीं पर तीन पत्थरों की चौकी बनाकर उस पर स्नान करने के लिए बैठ गई। रथवान सारंगिया विश्नोई ने झारी लेकर उसका पानी उन पर उडेल दिया। ज्योंही झारी का पानी उनके भौतिक शरीर पर गिरा त्यों हि उनके शरीर से एक ज्वाला निकली और उस ज्वाला में उसी क्षण उनका वह भौतिक शरीर अदृश्य हो गया। वहाँ कुछ भी नहीं था। ज्योति में ज्योतिर्लीन हो गये। इस प्रकार वि.सं. 1595 (1538 ई.) की चैत्र शुक्ला नवमी शनिवार को श्रीकरणीजी ज्योतिर्लीन हुए।

करणी माता मंदिर का निर्माण: एक क्रमिक विकास

करणी माता मंदिर का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया थी, जो सदियों तक चली। उनके महाप्रयाण के बाद, 1538 ईस्वी में, उनके पुत्र पूण्य राज और अनुयायियों ने देशनोक लौटकर उनकी मूर्ति स्थापित की थी। यह मूर्ति जैसलमेर के संगमरमर से एक अंधे शिल्पी बन्ना सुथार ने तीन महीने में तराशी थी। शुरुआती मंदिर, जिसे ‘मंढ’ कहा गया, यह एक कच्ची ईटो की संरचना थी, जिसमें जाल पेड़ों की छत थी। 15वीं सदी में आंतरिक गर्भगृह का निर्माण हुआ, जहां करणी माता की 75 सेमी ऊंची मूर्ति और उनकी बहनों की मूर्तियां स्थापित की गईं थी।

बीकानेर के आठवें शासक महाराज सूरसिंह ने करणी मंदिर में गोल भढ़ के चारों ओर चौकर मण्डप बनवाया था। उन्होंने परिक्रमा और मढ़ के सामने अन्तराल मण्डप भी बनवाया जिसके तीन ओर दरवाजें है, जिन पर देवी-देवताओं से चित्रित चाँदी के किवाड़ चढ़े हुए है। उसके बाद उन्होंने 1825 ईस्वी (वि.सं. 1882) को राव जैतसी द्वारा बनवाये गये कच्चे मढ़ के स्थान पर पक्का गुम्बददार मंदिर, उसके चारों ओर एक पक्का परकोटा व मंदिर का सिंह द्वार बनवाया तथा देपालसर (चुरू) के किले को तोडकर वही से लाये लोहे के बडे किंवाड सिंह द्वार पर चढाये और चाँदी के नकारों की एक जोडी भेंट की जिसके साथ ही महाराज सूरतसिंह ने शास्त्रोक्त रीति से श्री करणीजी के पूजन की व्यवस्था की जो आज तक चली आ रही है।

बीकानेर के 21 वें शासक महाराजा गंगासिंह ने सन् 1906 ई. में मंदिर के भीतर प्रांगण में संगमरमर के चौके जडवाये और परिक्रमा सुधारी। उन्होंने मध्य द्वार की छत पर सुनहरा चित्रांकन भी करवाया। इनके समय में कच्चे चौके पर लाल पत्थर के चौके लगाये गये थे जिन्हें हटाकर अब संगमरमर के सुन्दर टाईल्स लगा दिये गये है। बीकानेर के 20वें महाराजा डूंगरसिंह 1877 ई. (वि.सं. 1934) में भूज ब्याह कर जात देने के लिए देशनोक आये तो उन्होंने श्री करणीजी मंदिर में सोने का तोरण (जो मूर्ति के ऊपर लगा हुआ है), सोने के कटहरे (जो मूर्ति के दोनों बगलों में लगे हुए है) तथा सोने का चन्द्रहार (जो डूंगरसिंह की महारानी जाडेची ने भेंट किया) भेंट किया था। वर्तमान में मंदिर का प्रबंधन मंदिर की ट्रस्ट श्री करणी मंदिर निज प्रन्यास द्वारा किया जाता है।

करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर की वास्तुकला और संरचना

मंदिर की स्थापत्य शैली राजस्थानी और मुगल वास्तुकला का एक सुंदर मिश्रण है। यह पूरी तरह से संगमरमर से बना है, जिस पर आकर्षक नक्काशी की गई है। मुख्य द्वार पर चांदी के विशाल दरवाजे हैं, जिन पर देवी से जुड़ी किंवदंतियों को दर्शाया गया है। गर्भगृह में एक सोने का छत्र और चूहों के लिए चांदी की बड़ी परातें भी हैं।

मंदिर के गर्भगृह में, करणी माता की 75 सेंटीमीटर ऊँची मूर्ति एक हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए विराजमान है। मूर्ति के दोनों ओर उनकी बहनों की मूर्तियां भी स्थापित हैं। गर्भगृह की दीवारें सादी लेकिन मजबूत हैं, जो ध्यान को मूर्ति पर केंद्रित करती हैं।

करणी माता मंदिर देशनाेक के गर्भगृह में स्थापित करणी माता की मूर्ति
करणी माता मंदिर देशनाेक के गर्भगृह में स्थापित करणी माता की मूर्ति

मंदिर की संरचना में चूहों, जिन्हें काबा कहा जाता है, के लिए विशेष डिजाइन शामिल है। दीवारों में छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं, जिनसे 20,000-25,000 चूहे स्वतंत्र रूप से आते-जाते हैं। मंदिर के फर्श पर दूध, अनाज और पानी के पात्र रखे हैं, जो चूहों की देखभाल के लिए हैं। ये चूहे चारण वंश के पुनर्जन्म माने जाते हैं, और विशेष रूप से सफेद चूहों को करणी माता के पुत्रों का प्रतीक माना जाता है। मंदिर की संरचना इस तरह डिजाइन की गई है कि चूहों को कोई नुकसान न पहुंचे, और भक्त उनके साथ सामंजस्य में दर्शन कर सकें।

करणी माता मंदिर की वास्तुकला और संरचना राजस्थान की समृद्ध कला और संस्कृति का प्रतीक है। संगमरमर की नक्काशी, चांदी और सोने के दरवाजे, और चूहों के लिए विशेष व्यवस्थाएं इसे विश्व में अद्वितीय बनाती हैं।

करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर के प्रमुख त्यौहार और दैनिक गतिविधियाँ

करणी माता मंदिर में वर्ष में दो बार नवरात्रि के दौरान भव्य मेले आयोजित होते हैं—चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) और शारदीय नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर)। नवरात्रि के दौरान विशेष आरती और माता का श्रृंगार किया जाता है। ये मेले चारण समुदाय और अन्य भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इन मेलों में हजारों श्रद्धालु देशभर से, खासकर राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से देशनोक पहुंचते हैं, और मंदिर परिसर भक्ति भजनों, प्रार्थनाओं और सांस्कृतिक प्रदर्शनों से गूंज उठता है।

मंदिर सुबह 4:00 बजे खुलता है और रात 10:00 बजे बंद होता है। मंदिर सुबह 4:00 बजे मंगला आरती के साथ खुलता है। पुजारी गर्भगृह में करणी माता की की मूर्ति को फूल, वस्त्र, और आभूषणों से सजाते हैं। दिन के अंत में रात 10:00 बजे से पहले शाम की आरती होती है। भक्त चूहों को चना और दूध जैसे प्रसाद अर्पित करते हैं, यह मानते हुए कि इससे देवी प्रसन्न होती हैं।

करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर तक कैसे पहुँचें?

मंदिर का स्थान: करणी माता मंदिर राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक में स्थित है, जो बीकानेर शहर से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर है।

मंदिर तक पहुंचने के विकल्प इस प्रकार है:

  • हवाई मार्ग: नाल हवाई अड्डा बीकानेर (Bikaner Airport) मंदिर से लगभग 40 से 44 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई अड्डे से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
  • रेल मार्ग: करणी माता मंदिर का नजदीकी रेलवे स्टेशन देशनोक रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से लगभग 200 से 300 मीटर दूर है। दूसरा नजदीकी रेलवे स्टेशन बीकानेर जंक्शन रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। रेलवे स्टेशन से आप टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
  • सड़क मार्ग: मंदिर बीकानेर बस स्टैंड से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। आप टैक्सी, बस, या अन्य सड़क परिवहन सेवाएँ लेकर बीकानेर पहुँच सकते हैं। बीकानेर पहुँचने के बाद आप स्थानीय बस, टैक्सी, या ऑटो-रिक्शा से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।

करणी माता मंदिर देशनोक बीकानेर के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

  1. बीकानेर से करणी माता का मंदिर कितना दूर है?

    बीकानेर से करणी माता का मंदिर लगभग 30 किलोमीटर दूर है।

  2. करणी माता का मेला कब भरा जाता है?

    करणी माता का मेला साल में दो बार दोनों नवरात्रों के दौरान भरता है: पहला मेला मार्च-अप्रैल के महीने में चैत्र नवरात्रि के दौरान, और दूसरा मेला सितंबर-अक्टूबर के महीने में शारदीय नवरात्रि के दौरान। इन मेलों के दौरान, मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

  3. करणी माता का विवाह किससे हुआ था?

    करणी माता का विवाह साटिका गाँव के जागरीदार देपाजी चारण से हुआ था, जो रोहड़िया वंश के थे। हालांकि, उन्होंने विवाह के बाद गृहस्थ जीवन नहीं अपनाया और देपाजी से अनुरोध किया कि वे उनकी बहन गुलाब बाई से विवाह कर लें, जिसे देपाजी ने स्वीकार कर लिया था।


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