काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश | Kashi Vishwanath Temple Varanasi Uttar Pradesh

काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। वाराणसी, जिसे काशी या बनारस के नाम से भी जाना जाता है, न केवल भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक राजधानी है, बल्कि यह भगवान शिव का निवास स्थान भी माना जाता है। यह मंदिर गंगा नदी के तट पर स्थित है और हर साल लाखों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ आते हैं।

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काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश (Kashi Vishwanath Temple Varanasi Uttar Pradesh)

मंदिर का नाम:-काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple)
स्थान:-वाराणसी, उत्तर प्रदेश
समर्पित देवता:-भगवान शिव (विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग)
निर्माण वर्ष:-प्राचीन काल (वर्तमान संरचना 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित)
प्रसिद्ध त्यौहार:-महाशिवरात्रि, सावन मास

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश का इतिहास

काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश का इतिहास एक समृद्ध और जटिल कथा है, जो प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक फैली हुई है। यह मंदिर हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और भगवान शिव को समर्पित है।

काशी विश्वनाथ मंदिर पौराणिक जड़ें और उल्लेख

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास सदियों पुरानी पौराणिक कथाओं और प्राचीन ग्रंथों में निहित है, जो इसकी दिव्यता और महत्व को स्थापित करते हैं। मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। विशेष रूप से, स्कंद पुराण के “काशी खंड” में 1099 मंदिरों का उल्लेख है, जिनमें से 513 शिव को समर्पित हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि विश्वनाथ मंदिर को पहले मोक्ष लक्ष्मी विलास के नाम से जाना जाता था।

काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ और मान्यताएँ हैं। यहाँ कुछ प्रमुख कथाओं के बारे में जानकारी दी गई हैं:

  • ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और ब्रह्मा-विष्णु का विवाद: यह सबसे प्रमुख कथा है। ब्रह्मा और विष्णु में अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब भगवान शिव एक विशाल अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए, जिसका आदि और अंत कोई नहीं पा सका। ब्रह्मा ने झूठ बोला कि उन्होंने उसका अंत देख लिया, जिसके कारण शिव ने उन्हें श्राप दिया कि उनकी पूजा नहीं होगी, जबकि विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने विष्णु को आशीर्वाद दिया कि वे हमेशा पूजे जाएंगे और सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में सम्मानित होंगे।
  • काशी का शिव का प्रिय धाम होना: शिव पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, काशी भगवान शिव का अत्यंत प्रिय स्थान है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं इस नगर की स्थापना की थी और वे इसे कभी नहीं छोड़ते। वे अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करने के लिए यहां निवास करते हैं।
  • पार्वती का कैलाश छोड़कर काशी आने का आग्रह: एक कथा के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर रहते थे। माता पार्वती अपने पिता के घर से ऊब गईं और उन्होंने शिव से उन्हें अपने घर ले जाने का आग्रह किया। तब भगवान शिव पार्वती को काशी ले आए और तभी से काशी उनका स्थायी निवास बन गया।
  • राजा देवदास और काशी का निर्मनुष्य होना: एक अन्य कथा में राजा देवदास का उल्लेख है, जिन्होंने काशी पर शासन किया था। भगवान शिव को राजा देवदास की नगरी बहुत पसंद आई। शिव जी के लिए एक शांत जगह ढूंढने के लिए निकुंभ नामक शिवगण ने वाराणसी नगरी को निर्मनुष्य कर दिया। इससे राजा को बहुत दुःख हुआ। बाद में, ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के बाद, शिव पुनः काशी में निवास करने आए।

विध्वंस और पुनर्निर्माण का चक्र: एक ऐतिहासिक गाथा

इतिहासकारों के अनुसार, ईसा पूर्व 11वीं शताब्दी में राजा हरिश्चंद्र ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके बाद सम्राट विक्रमादित्य ने भी इसका जीर्णोद्धार करवाया था। हालांकि, मंदिर के निर्माण या प्रारंभिक जीर्णोद्धार में उनकी भूमिका को लेकर ऐतिहासिक साक्ष्य सीमित हैं, लेकिन लोक कथाओं और कुछ ग्रंथों में उनका नाम जुड़ा हुआ है।

काशी विश्वनाथ मंदिर को कई बार मुस्लिम शासकों द्वारा ध्वस्त किया गया, जो इसके इतिहास का एक दर्दनाक पहलू है।

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1194 में कुतुब-उद-दीन ऐबक (मोहम्मद गौरी का सेनापति) ने मंदिर को नष्ट कर दिया और कुछ साल बाद, इसके स्थान पर रजिया मस्जिद का निर्माण किया गया था। उसके बाद इसे 1230 में इल्तुतमिश (1211-1266 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान, एक गुजराती व्यापारी ने इसे अविमुक्तेश्वर मंदिर के पास फिर से बनाया था।

उसके बाद 1447-1517 के बीच हुसैन शाह शार्की या सिकंदर लोदी के शासन में मंदिर फिर से तोडा/नष्ट किया गया था। मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल ने साल 1585 ईस्वी में अकबर के आदेश पर पंडित नारायण भट्ट की सहायता से इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।

मुगल बादशाह औरंगजेब ने 18 अप्रैल 1669 को सूबेदार अबुल हसन को हिंदू मंदिरों और विद्यालयों को ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। इसी आदेश के तहत, 2 सितंबर 1669 को मुगल सैनिक काशी पहुंचे और विश्वनाथ मंदिर पर हमला कर इसे ध्वस्त कर दिया था। इस फरमान के बाद, मंदिर तोड़ दिया गया और वहां एक मस्जिद बना दी गई जिसे ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जाना जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास में महारानी अहिल्याबाई होल्कर का योगदान अविस्मरणीय है। मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा 1669 में मंदिर को ध्वस्त करने के लगभग 111 साल बाद, मालवा की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 ईस्वी में वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू करवाया था। उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में दक्षिण का स्थान चुना, जो एक रणनीतिक और धार्मिक निर्णय था। 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबद को सोने से मढ़ने के लिए 1 टन सोना दान किया था।

आधुनिक विकास और वर्तमान स्थिति

आधुनिक काल में, 1983 से मंदिर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त ट्रस्टी बोर्ड द्वारा प्रबंधित किया जा रहा है। 239 वर्षों के बाद, मंदिर का कुंभाभिषेक (प्रतिष्ठा समारोह) 5 जुलाई 2018 को आयोजित किया गया था, जो तमिलनाडु के एक व्यापारिक समुदाय नट्टुकोट्टई नागरथर द्वारा आयोजित किया गया था।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में मंदिर और गंगा नदी के बीच आवागमन को आसान बनाने और भीड़भाड़ को रोकने के लिए अधिक जगह बनाने के उद्देश्य से किया था। 13 दिसंबर 2021 को मोदी जी ने एक पवित्र समारोह के साथ कॉरिडोर का उद्घाटन किया था।

इस परियोजना के अंतर्गत श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास 300 से अधिक संपत्तियों की खरीद और अधिग्रहण किए गए थे। लगभग 1400 दुकानदारों, किराएदारों और मकान मालिकों को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया गया और उन्हें मुआवजा दिया गया। इमारतों के विध्वंस के दौरान, गंगेश्वर महादेव मंदिर, मनोकामेश्वर महादेव मंदिर, जौविनायक मंदिर और श्री कुंभ महादेव मंदिर जैसे 40 से ज़्यादा ‘लुप्त’ मंदिर खोजे गए। इनमें से प्रत्येक मंदिर का इतिहास कई सदियों पुराना है।

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश की वास्तुकला और संरचना

काशी विश्वनाथ मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी भव्यता और दिव्यता भक्तों को आकर्षित करती है। इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में उत्तर भारत में प्रचलित नागर शैली में किया गया था। मुख्य मंदिर चतुर्भुज आकार का है और इसमें काल भैरव, कार्तिकेय, अविमुक्तेश्वर, विष्णु, गणेश, शनि, शिव, और पार्वती जैसे विभिन्न देवताओं को समर्पित छोटे मंदिर शामिल हैं।

मंदिर परिसर तीन भागों में विभाजित है: एक शिखर, एक सोने का गुम्बद, और एक सोने की शिखर जिस पर एक ध्वज और त्रिशूल है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग एक चांदी की वेदी पर रखा गया है और यह लगभग 60 सेंटीमीटर लंबा तथा 90 सेंटीमीटर परिधि का है।

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश का शिवलिंग
काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश का शिवलिंग

गर्भगृह के ठीक सामने नंदी बैल की एक मूर्ति स्थापित है। नंदी की मूर्ति का मुख ज्ञानवापी मस्जिद की ओर है, जो एक ऐतिहासिक और विवादित तथ्य है, क्योंकि हिंदू पक्ष का मानना है कि नंदी की मूर्ति का मुख हमेशा शिवलिंग की ओर होता है। मंदिर के इर्द-गिर्द, यहाँ पांच लिंगों का एक समूह है, जो संयुक्त रूप से नीलकंठेश्वर मंदिर कहलाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश तक कैसे पहुँचें?

मंदिर का स्थान: काशी विश्वनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विश्वनाथ गली में गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।

मंदिर तक पहुंचने के विकल्प इस प्रकार है:

  • हवाई मार्ग: हवाई मार्ग से मंदिर तक पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो मंदिर से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। यात्री एयरपोर्ट से ऑटो रिक्शा, टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन से मंदिर तक पहुंच सकते है।
  • रेल मार्ग: रेल मार्ग से मंदिर तक पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी जंक्शन है, जो मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर दूर है। यात्री रेलवे स्टेशन से ऑटो रिक्शा, टैक्सी, बस या अन्य स्थानीय परिवहन से मंदिर तक पहुंच सकते है।
  • सड़क मार्ग: वाराणसी उत्तरप्रदेश के अन्य शहरों और पड़ोसी राज्यों से सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आप टैक्सी, बस, या अन्य सड़क परिवहन सेवाएँ लेकर वाराणसी पहुँच सकते हैं। वाराणसी पहुँचने के बाद, आप स्थानीय बस, टैक्सी, या ऑटो-रिक्शा से मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
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