परशुराम महादेव मंदिर पाली | Parshuram Mahadev Temple Pali

राजस्थान की पवित्र धरती पर बसे मंदिर अपनी प्राचीनता, आध्यात्मिकता, और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। पाली और राजसमंद जिले की सीमा पर अरावली पर्वतमाला की गोद में स्थित परशुराम महादेव मंदिर ऐसा ही एक तीर्थस्थल है, जो भगवान शिव को समर्पित है। यह प्राचीन गुफा मंदिर भगवान परशुराम, विष्णु के छठे अवतार, द्वारा निर्मित माना जाता है और इसे “मेवाड़ का अमरनाथ” कहा जाता है।

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3600-4000 फीट की ऊँचाई पर बने इस मंदिर तक 500 सीढ़ियों की चढ़ाई और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा रास्ता श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। स्वयंभू शिवलिंग, गोमुख से प्राकृतिक जलाभिषेक, और सावन का जीवंत मेला इस मंदिर को विशेष बनाते हैं।

परशुराम महादेव मंदिर पाली (Parshuram Mahadev Temple Pali)

मंदिर का नाम:-परशुराम महादेव मंदिर (Parshuram Mahadev Temple)
स्थान:-देसूरी तहसील, पाली, राजस्थान (पाली और राजसमंद जिले की सीमा पर)
समर्पित देवता:-भगवान शिव
निर्माता:-भगवान परशुराम (विष्णु का छठा अवतार) द्वारा निर्मित
प्रसिद्ध त्यौहार:-सावन मेला (श्रावण शुक्ल एकादशी)

परशुराम महादेव मंदिर पाली का इतिहास

परशुराम महादेव मंदिर का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है, जब भगवान परशुराम ने अपने फरसे से अरावली की चट्टान को काटकर इस गुफा मंदिर का निर्माण किया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम ने इस गुफा में भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अमरत्व, एक अजेय फरसा, और दिव्यास्त्र प्रदान किए। यह मंदिर परशुराम की भक्ति और शक्ति का प्रतीक है।

त्रेता युग में ही, एक अन्य कथा के अनुसार, परशुराम ने अपनी माता रेणुका की हत्या (पिता जमदग्नि के आदेश पर) के पाप से मुक्ति पाने के लिए पास के मातृकुंडिया में तपस्या की थी। इस दौरान उन्होंने परशुराम महादेव गुफा में शिवलिंग की पूजा की थी, जिससे उन्हें पापमुक्ति प्राप्त हुई थी। मातृकुंडिया की निकटता और मंदिर के तीन प्राकृतिक कुंड, जो वर्षभर पानी से भरे रहते हैं, इस कथा को बल प्रदान करते हैं। ये कुंड तीर्थ के रूप में पूजे जाते हैं, और भक्त मानते हैं कि यहाँ स्नान और दर्शन से पापों से मुक्ति मिलती है। यह कथा मंदिर के धार्मिक महत्व को और गहरा करती है, क्योंकि यह परशुराम के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ी है।

द्वापर युग में मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, परशुराम ने इस गुफा में कर्ण को शस्त्र विद्या और दिव्यास्त्रों की शिक्षा दी थी। परशुराम, जो केवल ब्राह्मणों को शिक्षा देते थे, ने कर्ण को ब्राह्मण समझकर प्रशिक्षित किया था, लेकिन बाद में उसका क्षत्रिय होने का पता चला था। यह कथा मंदिर को महाभारत से जोड़ती है और इसके ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाती है। गुफा की दीवारों पर राक्षस की छवि और प्राचीन नक्काशी परशुराम की युद्धकला और शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं।

मध्यकाल (8वीं-12वीं शताब्दी) में मंदिर मेवाड़ और मारवाड़ की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बना था। इसका स्थान, जो पाली (मारवाड़) और राजसमंद (मेवाड़) की सीमा पर है, इसे दोनों क्षेत्रों के शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ था। मेवाड़ के राणाओं और मारवाड़ के राजपूत शासकों ने मंदिर की देखभाल की, जिससे इसकी प्रसिद्धि बढ़ी थी।

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आधुनिक काल में मंदिर को “मेवाड़ का अमरनाथ” के रूप में व्यापक प्रसिद्धि मिली है, क्योंकि इसकी गुफा और प्राकृतिक जलाभिषेक अमरनाथ मंदिर से मिलते-जुलते हैं। मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय प्रशासन ने सुविधाएँ जैसे धर्मशाला, शाकाहारी भोजनालय, और 500 सीढ़ियों का निर्माण किया था, जिससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या बढ़ी है।

मंदिर की प्राचीनता को प्राचीन ग्रंथों और स्थानीय किंवदंतियों में उल्लेख मिलता है, जो इसे युगों पुराना सिद्ध करते हैं। हालांकि सटीक निर्माण तिथि उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसकी गुफा-आधारित संरचना और स्वयंभू शिवलिंग इसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक बनाते हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

परशुराम महादेव मंदिर (Parshuram Mahadev Temple)
परशुराम महादेव मंदिर (Parshuram Mahadev Temple)

परशुराम महादेव मंदिर पाली की वास्तुकला और संरचना

परशुराम महादेव मंदिर एक प्राकृतिक गुफा मंदिर है, जो अरावली की चट्टान को काटकर बनाया गया है। यह राजस्थानी गुफा वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गुफा, जिसमें स्वयंभू शिवलिंग और गोमुख से निकलने वाला प्राकृतिक जल है। गुफा की दीवारों पर प्राचीन नक्काशी और एक राक्षस की छवि उकेरी गई है, जो परशुराम के राक्षस वध की कथा को दर्शाती है। मंदिर की सादगी और प्राकृतिक संरचना इसे अन्य भव्य मंदिरों से अलग बनाती है।

परशुराम महादेव शिवलिंग
परशुराम महादेव शिवलिंग

मंदिर का प्राकृतिक सौंदर्य इसकी 3600-4000 फीट की ऊँचाई और अरावली पर्वतमाला की हरियाली से है। सावन और भादों के महीनों में यहाँ झरने, घने जंगल, और प्राकृतिक सुंदरता चरम पर होती है। मंदिर कुम्भलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के निकट है, जो इसे प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षक बनाता है। तीन प्राकृतिक कुंड, जो वर्षभर पानी से भरे रहते हैं, मंदिर के परिसर में शांति और पवित्रता का अनुभव प्रदान करते हैं। 500 सीढ़ियों का रास्ता, जो घने जंगल और पहाड़ी दृश्यों से होकर गुजरता है, यात्रा को रोमांचक और आध्यात्मिक बनाता है।

परशुराम महादेव मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

परशुराम महादेव मंदिर का धार्मिक महत्व इसके स्वयंभू शिवलिंग और गोमुख से निरंतर होने वाले प्राकृतिक जलाभिषेक से है। स्थानीय लोग मानते हैं कि इस शिवलिंग का एक रहस्यमयी छिद्र है, जो पानी से नहीं भरता, लेकिन दूध डालने पर अवशोषित हो जाता है। यह चमत्कार मंदिर की पवित्रता को और बढ़ाता है। एक मान्यता के अनुसार, बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने से पहले परशुराम महादेव के दर्शन करना शुभ माना जाता है, जो इसे उत्तर भारत के प्रमुख शिव तीर्थों से जोड़ता है।

मंदिर का सांस्कृतिक महत्व सावन मास और परशुराम जयंती (श्रावण शुक्ल एकादशी, अगस्त) पर आयोजित होने वाले वार्षिक मेले से है। इस मेले में हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं, और कालबेलिया नृत्य, गेर नृत्य, और भक्ति भजनों का आयोजन होता है। यह मेला राजस्थान की लोक संस्कृति और भक्ति परंपराओं को जीवंत करता है। स्थानीय लोग परशुराम को राक्षस वध के प्रतीक के रूप में पूजते हैं, और मानते हैं कि यहाँ दर्शन से दाम्पत्य जीवन की समस्याएँ, जैसे संतानहीनता या वैवाहिक कलह दूर होती हैं।

मंदिर में तीन प्राकृतिक कुंड हैं, जो वर्षभर पानी से भरे रहते हैं और तीर्थ के रूप में पूजे जाते हैं। ये कुंड मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति को और बढ़ाते हैं। परशुराम महादेव मंदिर मेवाड़ और मारवाड़ के भक्तों के लिए एक साझा आस्था का केंद्र है, जो इसे सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनाता है।

परशुराम महादेव मंदिर पाली तक कैसे पहुँचें?

पता: परशुराम महादेव मंदिर पाली और राजसमंद जिले की सीमा पर अरावली पर्वतमाला में स्थित है।

परशुराम महादेव मंदिर तक सड़क, रेल, और हवाई मार्ग से पहुँचा जा सकता है, इस प्रकार है:

  • सड़क मार्ग: मंदिर तक पहुँचने का सबसे आसान तरीका सड़क मार्ग है, जो पाली, उदयपुर, और जोधपुर जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा है। पाली से यह लगभग 100-120 किलोमीटर दूर है, जो 1.5-2 घंटे में पहुँचा जा सकता है। उदयपुर से लगभग 128-140 किलोमीटर (2.5-3 घंटे) और जोधपुर से लगभग 160 किलोमीटर (3 घंटे) है।
  • रेल मार्ग: रानी रेलवे स्टेशन (लगभग 40 किलोमीटर) या फालना (लगभग 50 किलोमीटर) से टैक्सी या बस से सादड़ी पहुँचें, फिर मंदिर तक जाएँ।
  • हवाई मार्ग: उदयपुर हवाई अड्डा (लगभग 128-140 किलोमीटर) से टैक्सी लेकर 2.5-3 घंटे में पहुँचा जा सकता है। जोधपुर हवाई अड्डा (लगभग 160 किलोमीटर) दूसरा विकल्प है।

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