तुलजा भवानी मंदिर, चित्तौड़गढ़ किले के भीतर राम पोल के निकट स्थित है। यह मंदिर माता दुर्गा के त्वरिता (त्वर्या) स्वरूप, तुलजा भवानी को समर्पित है, जिन्हें शक्ति और विजय की देवी माना जाता है। मेवाड़ के राजवंश और स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर कुलदेवी के रूप में विशेष महत्व रखता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ (Tulja Bhawani Temple Chittorgarh)
मंदिर का नाम:- | तुलजा भवानी मंदिर (Tulja Bhawani Temple) |
स्थान:- | राम पोल के पास, चित्तौड़गढ़ किला, चित्तौड़गढ़, राजस्थान |
समर्पित देवता:- | देवी तुलजा भवानी (दुर्गा का रूप) |
निर्माण वर्ष:- | 16वीं शताब्दी |
निर्माता:- | महाराणा बनवीर |
प्रसिद्ध त्यौहार:- | नवरात्री |
तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ का इतिहास
तुलजा भवानी मंदिर, चित्तौड़गढ़ का एक प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर है, जो माता दुर्गा के त्वरिता (त्वर्या) स्वरूप, तुलजा भवानी को समर्पित है। चित्तौड़गढ़ के तुलजा भवानी मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में हुआ था। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, इसका निर्माण 1536 से 1540 ईस्वी के बीच हुआ था।
इस मंदिर का निर्माण दासीपुत्र बनवीर ने करवाया था। बनवीर राणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज और उनकी उपपत्नी का पुत्र था। उसने 1536 से 1540 तक मेवाड़ पर शासन किया था, विक्रमदित्य की हत्या के बाद। बनवीर तुलजा भवानी का उपासक था और उसने अपने वजन के बराबर स्वर्ण का तुलादान करके इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
तुलजा भवानी मंदिर से जुड़ी कई किंवदंतियाँ और लोक कथाएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, चित्तौड़गढ़ के आसपास का क्षेत्र त्रासदियों और दुर्भाग्य से ग्रस्त था, और लोगों ने देवी तुलजा भवानी से हस्तक्षेप करने की प्रार्थना की थी। देवी ने एक भक्त ऋषि को अपने मंदिर के निर्माण के लिए एक स्वप्न में स्थान दिखाया था। यह भी कहा जाता है कि मंदिर में स्थापित मूर्ति स्वयं देवी द्वारा प्रकट हुई थी।
तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ की वास्तुकला और संरचना
मंदिर की वास्तुकला 16वीं शताब्दी की राजस्थानी शैली का एक उदाहरण है, जो हिंदू मंदिर वास्तुकला की विशेषताओं को दर्शाती है। दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की चित्रकारी और जटिल नक्काशियाँ हैं, जो माता दुर्गा की कथाओं और अन्य पौराणिक दृश्यों को चित्रित करती हैं। यह वास्तुकला मेवाड़ की स्थानीय कला और शिल्पकला का सुंदर उदाहरण है।
मंदिर अर्ध मंडप, मंडप और गर्भ गृह जैसे तीन प्रमुख भागों में बंटा हुआ है। गर्भ गृह मंदिर का केंद्रीय भाग है, जहाँ तुलजा भवानी की मूर्ति स्थापित है। मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने देवी का वाहन सिंह रखा गया है, और एक त्रिशूल भी स्थापित है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवताओं की नृत्यरत मूर्तियां दर्शनीय हैं।
मंदिर अर्धमंडप (आधा बरामदा), मंडप (पूरा बरामदा), अंतराल (आंतरिक कक्ष) और गर्भगृह (निजी कक्ष) से मिलकर बना है। गर्भगृह में माता की मूर्ति स्थापित है। मंदिर में एक खुला प्रांगण है जहाँ भक्त एकत्रित होते हैं।
तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ तक कैसे पहुँचें?
मंदिर का स्थान: तुलजा भवानी मंदिर चित्तौड़गढ़ किले के भीतर, राम पोल के पास स्थित है, जो किले के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट है।
तुलजा भवानी मंदिर, चित्तौड़गढ़ तक पहुँचने के तरीके:
- हवाई मार्ग: सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा उदयपुर हवाई अड्डा (महाराणा प्रताप हवाई अड्डा) है, जो दुर्ग से लगभग 90 किलोमीटर दूर है और यहाँ से बस टेक्सी या केब आसानी से उपलब्ध हो जाते हे।
- रेल मार्ग: चित्तौड़गढ़ जंक्शन (Chittorgarh Junction), जो मंदिर से लगभग 8 किलोमीटर दूर है। स्टेशन से किले तक पहुँचने के लिए ऑटो-रिक्शा, टैक्सी, या स्थानीय बस का उपयोग कर सकते हैं।
- सड़क मार्ग: चित्तौड़गढ़ सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है और राष्ट्रीय राजमार्ग NH 48 और NH 76 से होकर गुजरता है। आप सड़क मार्ग से बस या टैक्सी से चित्तौड़गढ़ पहुच सकते हो। चित्तौड़गढ़ बस स्टैंड से किले तक ऑटो-रिक्शा या टैक्सी से पहुँचा जा सकता है, जो लगभग 10-15 मिनट का समय लेता है।